योग भारत की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा रहा है।
योगासन का भारतीय इतिहास अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है, जिसकी जड़ें सिंधु घाटी सभ्यता तक फैली हुई हैं, जहां की पुरातात्विक खोजों में योग मुद्राओं और योगाभ्यास के तत्व मिले हैं जो बतलाते हैं कि योग भारत की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा रहा है। वैदिक कालमें योग का उल्लेख ऋग्वेद और उपनिषद जैसे ग्रंथों में मिलता है, जहां इसे मुख्यतः ध्यान, मानसिक एकाग्रता और आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम माना गया। महाकाव्यों और धर्मग्रंथों जैसे भगवद्गीता में योग के विभिन्न प्रकार – ज्ञान योग, भक्ति योग, कर्म योग, राज योग का वर्णन है, जो समाज के हर स्तर के लिए योग के व्यापक उपयोग को दर्शाता है। महान योगाचार्य महर्षि पतंजलि ने लगभग 200 ईसा पूर्व में योग सूत्रों के माध्यम से योग को व्यवस्थित सिद्धांतों में बाँधा, जिसने योग को एक प्रणालीबद्ध और वैज्ञानिक अभ्यास के रूप में स्थापित किया। इसके बाद हठ योग के ग्रंथों जैसे हठ योग प्रदीपिका और गोरक्षपद व्यास की रचनाओं ने योगासन और प्राणायाम के शारीरिक पहलुओं को विस्तार दिया। भारतीय संस्कृत साहित्य, पुराण, और शास्त्रों में योग का महत्व बार-बार सामने आता है, जहां योग को केवल एक शारीरिक अभ्यास नहीं बल्कि जीवन के चारों आयामों – शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और नैतिक विकास के लिए सम्पूर्ण विज्ञान माना गया। योग की यह परंपरा कालक्रम में विकसित होती रही और आज भी विश्वभर में अपनी विविध शाखाओं और विधाओं के माध्यम से लोगों को स्वास्थ्य, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति की ओर मार्गदर्शन प्रदान कर रही है। योग के आदर्शों और आसनों का यह भारतीय इतिहास मानव जीवन की समग्र उन्नति के लिए अनमोल धरोहर है, जो सदियों से हमारे संस्कारों और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। योग के इस विशाल और प्राचीन इतिहास से यह स्पष्ट होता है कि योग मात्र व्यायाम नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन और आध्यात्मिकता का मूल आधार हैं।
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह
