कविता

दोष मढ़ना

हां वो समझने लगा है कि
आराम से कर लेंगे किसी के लेखन कला की गणना,
और शुरू कर अपना दोष औरों पर मढ़ना,
एक दिन नशे में साहब जी
किसी दिन को और दिन समझ गया,
फरमान जारी किया भेजिए कृति नया,
पहले तो लोग हिचकिचाये,
क्या करें सोच हड़बड़ाये,
कुछ ने सवाल किया आज यह कैसे?
कइयों ने परिपाटी अपनायी भेड़ों जैसे,
बीस तीस लोगों ने रचनाओं का अंबार लगाया,
जल्दी जल्दी कृतित्व साहब को पंहुचाया,
नशा उतरते ही साहब सब पर भड़के,
क्यों ध्यान नहीं रखा गया क्रोध में कड़के,
बोले मैं तो ले रहा था ज्ञान और ध्यान की परीक्षा,
तुम सब लोग थोपे हो मुझ पर अपनी इच्छा,
जाओ तुम लोगों को नहीं दूंगा स्थान,
तुम लोगों ने हरण किया है मेरा मान,
जितनों ने दिखाया था कृतित्व का जोश,
साबित किया गया उन सबका दोष,
गलती न होने पर भी कुछ लोग गुनाहगार हो गए,
साहब दोष मढ़कर शहंशाही सरकार हो गए।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554