ग़ज़ल
अब न कोई लन तरानी चाहिए
हर बयां में हक़ बयानी चाहिए
एक लय में सुर सरानी चाहिए
अब ग़ज़ल में इक रवानी चाहिए
गर वज़ारत से नवाजा है गया
अब न करनी बदज़ुबानी चाहिए
ख़ूबसूरत है फ़ज़ा रंगीन भी
इक ग़ज़ल नव गुनगुनानी चाहिए
गाँव का घर खेत यूँ बेचा नहीं
कुछ तो पुरखों की निशानी चाहिए
होचुकाहै मनकामाफिक कामसब
अब तो सूरत जगमगानी चाहिए
चीज़ कुछ भी हो मगर मेरे हुज़ूर
उससे मुझको इक निशानी चाहिए
— हमीद कानपुरी
