कहानी

कहानी – बिन बांधे, बंधन

14 सितंबर यानी हिंदी दिवस आने ही वाला था । हर जगह विद्यालयों, संस्थानों में इसकी तैयारी जोर-शोर से चल रही थी। संस्थानों, विद्यालयों में तो एक अलग ही जोश था। कृति भी अक्सर प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती।
स्थानीय भाषा बांग्ला होने के कारण इस पूरे प्रदेश में हिंदी का बोलबाला कुछ काम था। पूरी कॉलोनी में इक्के- दुक्के ही हिंदी भाषा भाषी थे, जिससे आम बोल -चाल की भाषा भी बंगला ही थी। नए साहित्यकारो, लेखकों को तो मानो मंच ही नहीं मिलता ।
कृति जिसे घर यहां तक कि पूरी कोलोनी में “डोल ” कहते। सचमुच दिखती भी बिल्कुल वैसे ही जैसे सामने एक गुड़िया खड़ी हो। मासूम चेहरा, झुकी नजरें, आंखों में उड़ने की चाहत !
अभी भी दो दिन बचे हैं। अधिकारी शिक्षक सभी इस समारोह के आयोजन में जुटे पड़े थे।
कृति त्रिपाठी को भी इस आयोजन में आने का निमंत्रण दिया गया। वह मन ही मन बहुत खुश हुई। स्कूली आयोजनों के बाद यहां इतनी दूर पहली बार जो मौका मिला था।
लाख इच्छाओं के होते हुए भी वह परिवार की स्थितियों को देख मौन रही। करती भी क्या आखिर, बचपन से ही अकेलेपन ने जो उसका साथ निभाया था।
डोल के जग में आते ही पिता को यमराज ने अपने पास बुला लिया। अकेली मां ने माता-पिता दोनों का फर्ज निभाया। बड़ी ही कठिनाइयों से जीवन -यापन किया, लेकिन हां, मां- बेटी का रिश्ता उनके सामने हर रिश्ता फीका लगता ! बेटी को बेटी कह दो या दोस्त, दोनों एक दूसरे से हर बात बताते । मां (सोनम )भी बिना बताए ही उसकी हर मन स्थिति को भांप लेती। निमन्त्रण पत्र देखते ही सोनम ने बेटी डोल को भी आयोजन में ले जाने का फैसला किया। यह सुन डोल की खुशी का ठिकाना ना रहा ।
वह भी जमकर तैयारी में लग गई। सभी आयोजन कर्ताओं एवं साहित्यिकारो को भी एक ही होटल में रहने की सुविधा भी की गई थी ।
कृति और मां सोनम दोनों भी उसी होटल में पहुंचे ही थे कि एक वृद्ध सहज, सरल, आभासी दुनिया का पहचाना चेहरा सामने से गुजरते ही “
आप कृति हो?” समर ने पूछा।
“हां, मगर आप समर सर! “
हां, चरण स्पर्श के लिए झुकी ही थी कि अरे ! बेटा नहीं चाहिए फूलो- फलो भगवान तुम्हारा भला करें! सचमुच मन -मस्तिष्क में आपके लिए जो छवि बनी थी बिल्कुल वैसे ही हो, समर ने कहा।
“मतलब सर “कृति ने जानने की इच्छा जताई।
अरे नहीं, कुछ नहीं! आप तो बिल्कुल” डोल” जैसी दिखती हो।समर दादा ने कहा।
सर मेरे घर का नाम डोल ही है। कृति ने बताया।
“अरे ! वाह”
सर मैं तो आपकी बच्ची जैसी हूं ।
हां- हां, अरे बैठो तो !
हां सर, ठीक है। कृति ने कहा।
बैठो भी, कुछ नहीं होगा। क्या संकोच करना!समर जी ने कहा।
समर दादा कुछ रोजमर्रा की जिंदगी की बातें तो कुछ साहित्य समाज से जुड़ी बातें करते, समझाते रहे ।इसी बीच साहित्यकारों का जमावड़ा बढ़ता गया । कुछ उनकी बातें सुनते तो कुछ गप्पबाजी में व्यस्त थे। मुख पर चुप्पी देख, “अरे, कहां खो गई हो तुम!” इतना सुनते ही डोल की आंखें छलछला गईं।
“क्या हुआ बेटा ?”, समर ने पूछा।
“नहीं दादा कुछ नहीं !”
“बताओ तो, दादा आज तक मुझे इतना कुछ किसी ने नहीं समझाया, जितना आपने इस 30 मिनट के समय में बताया ।
सोनम चुपचाप बैठी उसकी भावनाओं को समझती रहीं । आंखें देख मां का दिल सिहर उठा।
क्या हुआ बहन इसे! समर दादा ने पूछा
नहीं भैया, वह इसने पापा को कभी नहीं देखा । शायद इसलिए कुछ भावुक हो गई।
” ओ हो, बेटा मैं समझ सकता हूं। एक बेटी के लिए एक घर के लिए पिता ही उसकी रीढ़ की हड्डी होता है और खासकर बेटियां तो वैसे ही पिता की लाडली होती है। पर बेटी कोई बात नहीं, तुम्हें तो यह सोचकर खुश होना चाहिए कि तुम्हारे पास इतनी प्यारी मां है वरन् कुछ लोगों को तो वह भी नसीब नहीं होता । सोच कर देखो तुम्हें तो साहित्य जगत में तुम्हारी मां का साथ मिल रहा है और क्या चाहिए! बातों ही बातों में उन्होंने यह भी बताया कि बेटा खुश होने का सबसे आसान नुस्खा संतोष होता है, यह शब्द जिसने अपनी जिंदगी में आजमा लिया वह कभी दुखी नहीं रह सकता । कर्म को प्राथमिकता दो और संतोष करो । डोल गौर से उनकी बातें सुनती रही।
करीब रात्रि नौ बजने ही वाला था ।चलो थोड़ा कुछ रात्रि भोजन कर लेते हैं । सुबह समारोह भी है। इतना सुनते ही पूरी जमात साथ ही चल पड़ी, लेकिन सभी अपनी गुट में व्यस्त थे और समर दादा डोल और सोनम में व्यस्त थे। अगली प्रातः समारोह का आयोजन हुआ, सभी ने आयोजन में बड़ी ही तत्परता से भाग लिया । डोल ने भी अपनी जोशीली अंदाज में अपनी स्वयं रचित कविता का पाठ किया। उसके कविता के धुन के साथ वाह वाहियो और करतल ध्वनि ने पूरे समारोह स्थल में जान ला दी। यह देख मां का सिर गर्व से ऊपर हो गया । वही समर दादा के चेहरे पर खुशी साफ प्रस्फुटित हो रही थी। डोल का विश्वास मानो चरम छू रहा था। डोल को भी अंग वस्त्र तथा मेमेंटम से सम्मानित किया गया । अंतस्थ अवस्था में समर दादा ने उसके कमियों को भी समझाया।
कुछ वक्त बाद ही दादा आप आज ही जा रहे हैं ?
हां बेटा, मेरी आज की ही टिकट है। दादाजी लेकिन कम से कम आज तो रुक जाते।
अरे बेटा, कोई नहीं अब तो मिलना मिलाना होता ही रहेगा ।
इतना कह कुछ आगे बढ़े ही थे कि दादाजी (पीछे से एक मिठी सी ध्वनि गूंजी) डोल के बढ़ते कदम देख दो पल दादा थम कर
अरे बेटा, तुमने कुछ बोला क्या?
दादाजी, एक बात कहूं?
क्या! जल्दी बोलो बेटा,
दादा जी, क्या मैं आपको बाबा बोल सकती हूं?
बेटा ! दो मिनट थम कर
बेटा, दादा और बाबा में कोई खास अंतर नहीं !
दादा जी, मुझे बाबा बोलने का बचपन से ही बहुत शौक रहा है।आज तक मुझे इतना अपनापन किसी से नहीं मिला और नहीं मिलेगा। फिर भी यदि आपकी अनुमति हो तभी मैं…..
बेटा, जोर से गले लगाते हुए। जरूर बेटा, आज से तुम मेरी बेटी और मैं तुम्हारा बाबा! अब मुझे जाने दो वरना मेरी ट्रेन छूट जाएगी।
बाबा ने मुस्कुराते हुए कहा।
जरूर बाबा जरूर ।
बाबा अपने रास्ते और डोल अपने होटल के कमरे की ओर बढ़ गई । अगली प्रातः यादों की खूबसूरत बारात लिए डोल भी अपने घर आ गई । उसके मन मस्तिष्क में बाबा की एक-एक बातें मानो गांठ बंधी हुई थी । अब हर पल उनकी बातों को ही सोचती। यहां तक की हर पल वह मां से भी उनकी ही बातें करती। यह सुन मां को अजीब भी लगता लेकिन फिर भी उसकी भावनाओं को देख वह मौन ही रहती। उधर डोल हर दिन आभासी दुनिया से बाबा का हर पल खबर भी लेती। बाबा भी साहित्य जगत की नई-नई बातें समझाते। महीने- महीने बीत गए।
अचानक एक दिन फोन की घंटी बजी। किसी डॉक्टर के फोन पर वह दंग भरे स्वर में बोली। जी हेलो,
क्या आप डोल मल्होत्रा बोल रही हैं?
जी, मगर आप कौन?
मुझे आपका नंबर समर अग्रवाल के मोबाइल से मिली है।दरअसल उनकी तबीयत खराब है उन्हें माइनर हार्ट अटैक आया है । हमने उन्हें आईसीयू में रखा है, लेकिन वह सिर्फ कुछ डोल -डोल ही बोले जा रहे हैं ।माफ कीजिए, हमने उनके मोबाइल से आपका और कुछ दो-चार लोगों का नंबर ट्रेस करके उनकी तबीयत बताना जरूरी समझा । यह सुनते ही डोल स्तब्ध हो खड़ी ही रही। यदि आपकी इच्छा हो तो आप एक बार उनसे मिल लीजिए।
जी-जी जरूर सर, मैं आने की पूरी कोशिश करती हूं। दरअसल में पाकुड़ में हूं तो थोड़ा वक्त तो लग ही जाएगा।
मां मुझे भागलपुर जाना होगा। डोल ने दबे स्वर में मां से कहा।
क्यों? (कुछ क्रोध दंग स्वर में)
मां बाबा की तबीयत खराब है, डॉक्टर साहब बता रहे थे कि वह केवल डोल – डोल ही बोले जा रहे हैं।
बेटा, लेकिन यह कैसे संभव है? भागलपुर तो यहां से बहुत दूर भी है, और लोग क्या बोलेंगे?
मां वह बीमार है, मुझे बुला रहे हैं फिर.. और लोगों की कौन सुनता है? कुछ पल थम कर वह बोली– मां क्या वह असली पापा होते तो भी आप मुझे जाने से रोकती?
डोल, मां ने जोर से चिल्लाते हुए कहा।
इतना कहते ही वह अपने कमरे की ओर बढ़ गई।
बेटा भोजन तैयार है आ जाओ ठंडी हो जाएगी।घंटे बाद सोनम ने आवाज लगाई ।
” मां मुझे भूख नहीं है, आप खा लीजिए “।
मां अंदर आ सामने डोल के नजरे मिलाए देखती ही जा रही थी। भावनाओं में डूबी डोल बोली–मां जाने दीजिए ना । बहुत मुश्किल से मैंने बाबा पाया है, यदि उन्हें फिर कुछ हो गया तो…!
इतना सुनते ही वह सोच में पड़ गई।देखो तो, तत्काल में भागलपुर की टिकट है क्या? मां ने कहा। रियली मम्मी,अभी देखती हूं !मममी, लेकिन एक ही टिकट है, वही कर लेती हूं।
बेटा, लेकिन पूरी रात का सफर है एक टिकट से कैसे? मां ने चिंता जताई।
मम्मी हो जाएगा, आप बैठ जाना ।
अरे बेटा,
मम्मी टेंशन मत लो, बस मुझे जाना है अपने बाबा के पास ।
बेटा तू बावली हो रही है।
मम्मी -मम्मी मैं फटाफट पैकिंग कर लेती हूं ।
अगली प्रातः दोनों भागलपुर के लिए निकल पड़े । वहां पहुंचते ही स्टेशन से निकल पहले अस्पताल फिर रिसेप्शन से जानकारी लेते हुए बाबा के कमरे ….
बंद दरवाजा, सपाट पड़े बाबा हवा की थैली देख,
बाबा, आपकी बेटी आ गई ।
धीरे बोलो, नर्स ने धमकाते हुए कहा।
उसने पुनः आवाज लगाई, बाबा…. ।
यह ध्वनि सुन मानो उनके कानों में एक सिहरन सी हुई ।फिर से बोलो -नर्स ने कहा
बाबा, मैं डोल।
उनके हाथों में पुनः हलचल देख नर्स ने डॉक्टर साहब को फोन कर बुलाया। सर वार्ड नंबर तीन में, व्यक्ति का सेंस आ रहा है ।
ओके,आई विल जस्ट कम, यू टेक केयर।
डॉक्टर साहब को देख, सर क्या मैं भी अंदर आ सकती हूं ? डोल ने पूछा
नहीं, डाक्टर साहब ने गुस्से से कहा। दो मिनट आप यहीं रुकिए, मैं उनकी कंडीशन पहले देख लेता हूं।
“मैडम, क्या आप ही डोल हो ?” डॉक्टर साहब में दरवाजे पर आकर पूछा।
हां सर,
आइए,आइए
बाबा मैं आ गई, ( उत्सुकता भरे स्वर में सामने जाकर) बाबा आप जल्दी ठीक हो जाओ।
बेटा अब तुम आ गई हो ना जल्दी ही ठीक हो जाऊंगा। बाबा ने अधखुले नयन से कहा।
डॉक्टर साहब वहीं खड़े आश्चर्य भरे सुधार को देख,
स्ट्रेंज, रियली स्ट्रेंज! नर्स से बुदबुदाते हुए स्वर में कहा। अब आप थोड़ा आराम कर लीजिए। डॉक्टर साहब ने सलाह के तौर पर कहा।
ठीक है दोपहर तक आपको आईसीयू से बाहर निकाल देते हैं लेकिन डिस्चार्ज कल ही करेंगे। इतना कह डॉक्टर साहब आगे की ओर बढ़ गए।
अरे ठीक है, चलो बेटा मुझे यहां से ले चलो
जनरल कमरे में! यहां आते ही तीनों के बातें मानो पूरे वार्ड में गूंज रहा था। डोल और बाबा की बाते कभी साहित्य के हिलौरें तो कभी जीवन की तरंगों की कहानी कहती। दोनों के साथ सोनम ताल से ताल मिलाती रही। संध्या, रात फिर सूरज की किरणें भी निकल आई। डॉक्टर साहब का ड्यूटी भी चलता रहा। डॉक्टर साहब उनके सामने दो पल खड़े होकर उनकी बातें, उनका मशगूल चेहरा देख खैरियत पूछने की जरूरत महसूस नहीं करते।
आज प्रातः डॉक्टर साहब पहुंचे ही थे कि– मुझे घर जाने दीजिए । समर दादा ने आवेदन कर कहा।
हां, दोपहर तक छोड़ देंगे। कुछ कागजी कारवाइयां में पूरी कर दीजिएगा । डाक्टर साहब ने कहा।
जी, जी जरूर ।
दो पल खड़े होकर, फिर बोले — अच्छा एक बात बताइए, आप मेरे बाबूजी के समान है । आज तक मैंने ऐसा केस नहीं देखा, जिसमें कल आई- सी -यू में और आज इतनी मुस्कुराहट! “जिसे देख अपनी ही आंखें यकीन नहीं कर पा रहा है। पढ़ाई फीकी पड़ रही है! डाक्टर साहब ने चिंता जताते हुए कहा।
अरे डॉक्टर साहब, यह सब तो मेरी बेटी और मेरे आत्मविश्वास का नतीजा है। इंसान की सफलता की पहली और आखिरी सीढी आत्मविश्वास ही है। समर दादा ने डॉक्टर साहब को समझाते हुए कहा।
मै सचमुच सलाम करता हूं आपको ! इतना कहते हुए वह आगे की ओर निकल गए।
डोल ने सॉरी कागजी कार्रवाइयों को पूरा कर बाबा को घर लाई। हालात को समझते हुए उसने दो दिनों बाद वापसी की टिकट भी बनवाई। इसी बीच अगली सुबह राची से बड़ा बेटा घर पहुंचा। बाबूजी, जोर की ध्वनि आई।
हां बेटा, धीमी स्वर में कुछ गंभीरता से बोले।
कैसी है आपकी तबीयत, बेटे ने पूछा।
बिल्कुल चंगा, चुस्त- दुरूस्त हूं, मुझे क्या हुआ है? समर दादा ने बताया। वह डॉक्टर साहब ने फोन कर इतला किया था कि आपकी तबीयत काफी खराब है आईसीयू में भर्ती है तो फिर आ गया….।
बेटा, वह तो परसों की बात है। मैं आज बिल्कुल ठीक हूं। सचमुच तुम तो बेकार ही आकर अपनी छुट्टी खराब किए । समर दादा ने व्यंग्य कर कहा।
बाबा, वह एक्चुअली जिस समय डॉक्टर साहब ने फोन किया उस वक्त छुट्टी नहीं मिली और ना ही नहीं रेल की टिकट थी जो आ पाता । आज तो सेकंड सेटरडे था तो सोचा टुकड़े-टुकड़े में ही जाऊं ।दो दिन का वक्त भी मिल जाएगा, आपको देखना भी हो जाएगा ।
बेटा तुम तो छुट्टी और टिकट के इंतजार करते रहे इसी बीच इस बच्ची ने आकर मेरी जान बचा ली। वरन तुम्हें आज यहां शायद सिर्फ बेजान वस्तुएं और दीवारें ही मिलती ।
बाबा ऐसा मत बोलिए। हमारे रहते आपको कुछ नहीं होगा। दोनों ने स्वर में स्वर मिलाकर बोला ।
डोल का हाथ थामे तुम जैसी बेटी जिसकी हो उसे तो यमराज को भी अपने साथ ले जाने में हजारों बार सोचना पड़ेगा। इतना कहते ही सबके चेहरे पर गंभीरता की हंसी के साथ मुस्कुराहट छा गई।

— डोली शाह

*डोली शाह

1. नाम - श्रीमती डोली शाह 2. जन्मतिथि- 02 नवंबर 1982 संप्रति निवास स्थान -हैलाकंदी (असम के दक्षिणी छोर पर स्थित) वर्तमान में काव्य तथा लघु कथाएं लेखन में सक्रिय हू । 9. संपर्क सूत्र - निकट पी एच ई पोस्ट -सुल्तानी छोरा जिला -हैलाकंदी असम -788162 मोबाइल- 9395726158 10. ईमेल - shahdolly777@gmail.com