खंडित स्वप्न : मोहभंग की व्यथा-कथा
असंख्य लोगों के बलिदान के बाद देश को आज़ादी मिली, लेकिन स्वतंत्रता के बाद आम जनता ने महसूस किया कि वास्तव में यह तो कागजी आज़ादी है, उनके जीवन में कोई बदलाव नहीं आया I स्वतंत्रता सेनानियों ने जो सपने देखे थे वे आज़ादी के बाद पूरे नहीं हुए I उनके आदर्श एक–एक कर धराशायी होने लगे, नैतिकता केवल भाषणों और शब्दकोशों में सिमटकर रह गई, मानवीय मूल्यों में आस्था रखनेवाले हाशिए पर डाल दिए जाने लगे और समाज को दिशा देनेवाले ही दिशाहीन हो गए I धीरे-धीरे देश की स्थिति बद से बदतर होती चली गई I चाटुकारिता समाज की संस्कृति और सफलता का मूल मंत्र बन गई I भ्रष्टाचार और मानवीय मूल्यों के क्षरण को देखकर ईमानदार व्यक्ति केवल आहें भरने के लिए अभिशप्त है I भ्रष्टाचार रूपी राक्षस देश को निगलने के लिए तैयार है, किंतु किसी को कोई चिंता नहीं I स्वतंत्रता के उपरांत अनेक कवियों और लेखकों ने आज़ादी के बाद उत्पन्न निराशा और मोहभंग की स्थिति को दर्शाने के लिए उपन्यास, कहानियाँ और कविताओं का सृजन किया है I हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार जयराम सिंह गौर ने अपने उपन्यास ‘खंडित स्वप्न’ में देश की दुर्दशा, नौकरशाही, आम आदमी की बेचारगी, विधायिका और कार्यपालिका की दिशाहीनता एवं भ्रष्ट व्यवस्था का प्रभावशाली चित्रण किया है I इस उपन्यास में सामाजिक और राजनैतिक विद्रूपताओं व विसंगतियों पर निर्मम प्रहार किया गया है I उपन्यासकार ने स्वातंत्र्योत्तर भारत में मानवीय मूल्यों में आयी भारी गिरावट को भी अभिव्यक्त किया है I इस उपन्यास में स्वतंत्र भारत की लालफीताशाही, आम आदमी की त्रासदी, नौकरशाही की निरंकुशता, रिश्वतखोरी, समाज की संवेदनहीनता आदि का जीवंत चित्रण किया गया है I किस प्रकार आज़ाद भारत में नौकरशाहों और नेताओं ने आम आदमी के सपनों को खंड-खंड कर दिया, उनकी छोटी-छोटी अभिलाषाओं को अपने पैरों तले रौंद डाला और उनकी बुनियादी सुविधाओं पर भी डाका डाल दिया यही ‘खंडित स्वप्न’ का कथ्य है I
स्वतंत्रता सेनानियों ने आत्मबलिदान करते हुए सपने देखे थे कि देश स्वतंत्र होगा तो अपना शासन होगा, कोई किसी पर अत्याचार नहीं करेगा, किसी का शोषण नहीं होगा, सभी मिलजुलकर देश को विकास के पथ पर अग्रसर करेंगे, लेकिन वास्तव में ऐसा कुछ नहीं हुआ I गोरे अंग्रेज की जगह काले अंग्रेज आ गए, शेष सब कुछ यथावत चलता रहा I देश में मैकाले की योजना साकार हुई और मैकाले पुत्र सत्तासीन हो गए I देश में गरीबों के विकास के लिए बड़ी-बड़ी सुनहरी योजनाएं बनती हैं, लेकिन गरीबों की गरीबी और अमीरों की अमीरी बढ़ती जाती है I दिन पर दिन समाज में पाखंड बढ़ता जा रहा है I ‘खंडित स्वप्न’ में आज़ादी के बाद आम आदमी की निराशा का प्रभावशाली चित्रण किया गया है I आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई इस औपन्यासिक कृति में स्वतंत्रता आंदोलन के संबंध में कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं द्वारा गढ़े गए झूठे नैरेटिव का पोस्टमार्टम किया गया है I
उपन्यास में महात्मा गाँधी के अतिशय मुस्लिम प्रेम की बखिया उधेड़ी गई है I कांग्रेस ने उन क्रांतिकारियों के बलिदान को रेखांकित नहीं किया जिन्होंने अपने रक्त से आज़ादी की महागाथा लिखी थी I कांग्रेस के नेता गाँधी और नेहरू की जयजयकार करते रहे जिनके लिए कारावास में भी महल जैसी सुख-सुविधाएं उपलब्ध थीं I लेखक कहता है-
‘मैं आज बयासी वर्ष का होने जा रहा हूँ, पर एक बात मुझे आज तक समझ में नहीं आ रही है कि इतने विराट व्यक्तित्व वाले कानून के विशारद महात्मा गाँधी, मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू ने क्रांतिकारियों के मुकदमों की पैरवी क्यों नहीं की ?’
आज़ादी मिलने के बाद आम आदमी के जीवन में कोई फर्क नहीं आया I आज़ादी के पहले जो जमींदार और धनपति मौज-मस्ती कर रहे थे वे ही बाद में भी सत्ता सुख भोगने लगे I उपन्यास में सवाल उठाया गया है कि कांग्रेस का बहुमत सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाना चाहता था, पर गाँधी जी ने नेहरू को प्रधानमंत्री क्यों बनवाया I उपन्यासकार ने गाँधी और नेहरू के निर्णयों को अनुचित एवं पक्षपातपूर्ण सिद्ध किया है I समकालीन राजनीति पर भी उपन्यासकार की पैनी नज़र है I परिवारवाद पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने लिखा है-‘जाने कैसी कांग्रेसियों की मानसिकता है, उन्हें नेहरू परिवार के अलावा कोई दिखता ही नहीं है, आज भी राहुल गाँधी में वह देश के भावी प्रधानमंत्री को देखते हैं I’ आज़ादी की लड़ाई में असंख्य लोगों ने आत्मोत्सर्ग किया, लेकिन इतिहास में सबसे अधिक श्रेय महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू को दिया जाता है I यह तथ्यात्मक रूप से गलत और पक्षपातपूर्ण इतिहास लेखन का उदाहरण है I ‘खंडित स्वप्न’ में इतिहास की इस आधी-अधूरी सच्चाई को भी बेनक़ाब किया गया है I उपन्यासकार ने उपन्यास में मिथ्यापरक इतिहास को उजागर किया है I
इधर जवाहरलाल नेहरू हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा दे रहे थे और उधर चीन ने भारत पर आक्रमण कर भारतीय भूभाग पर कब्ज़ा कर लिया I उनका पंचशील का नारा बेकार साबित हुआ, लेकिन कांग्रेसी नेता नेहरू का महिमामंडन करते रहे I चापलूस लेखकों और कवियों ने नेहरू के लिए बड़े-बड़े ग्रंथ लिख दिए जिसके लिए उनको बड़े-बड़े पुरस्कार दिए गए I आज़ादी के बाद देश में नव जमींदार और नव सामंत उत्पन्न हो गए जो अंग्रेजों से भी अधिक अत्याचारी, शोषक और निष्ठुर थे I ये लोग हर प्रकार के कुकर्म और जनता पर तरह-तरह के अत्याचार करते थे I नेता, मंत्री, नौकरशाह, पुलिस के उच्चाधिकारी देश के नए जमींदार हैं जो खुलेआम अन्याय और जनता का उत्पीड़न करते रहते हैं, लेकिन इस गठजोड़ के आगे जनता विवश है I ‘खंडित स्वप्न’ में नव सामंतों के शोषण और दमन का चित्रण किया गया है I उपन्यास में भारतीय समाज की संवेदनहीनता का मार्मिक विश्लेषण किया गया है I
उपन्यास का प्रमुख पात्र लाखन सिंह और सद्धू हैं I लाखन सिंह प्रगतिशील और सकारात्मक व्यक्तित्व के धनी हैं I जमींदार होने के बावजूद वे गाँव का विकास करना चाहते हैं I सद्धू को जब तक सत्ता का स्वाद नहीं मिला था तब तक उसका चरित्र ठीक था, लेकिन सत्ता के स्वाद और धनलिप्सा ने उसे भ्रष्ट बना दिया I सद्धू के बारे में लेखक ने लिखा है-‘सत्ता का नशा किसी भी नशे से अधिक मादक होता है, जिस पर चढ़ता है उतरने का नाम ही नहीं लेता I वही हाल सद्धू का हुआ I’ अब राजनीति सेवा नहीं, व्यापार बन गई है I एक लगाओ दस पाओ I अगर राजनीति व्यापार नहीं होती तो लोग चुनाव जीतने के लिए इतनी मारामारी क्यों करते I सांसद से लेकर ग्राम प्रधान तक का चुनाव खर्चीला हो गया है I कोई सामान्य आदमी तो चुनाव लड़ ही नहीं सकता है और अगर लडेगा तो जीत नहीं सकता है I
देश में जातिवाद का जहर फ़ैल चुका है I इस विष को फ़ैलाने में सभी वर्ग के लोग शामिल हैं I अगड़े-पिछड़े, सवर्ण-दलित सभी अपने-अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए जातिवाद का नगाड़ा बजाते हैं I जातिवाद का दीमक देश को खोखला कर रहा है, लेकिन किसी को चिंता नहीं है I जिस लाखन सिंह ने सद्धू को आगे बढ़ाया उनके प्रति सद्धू के मन में कोई सद्भाव नहीं है I वह जब से हरिजन संगठन का सदस्य बना है तब से उसके व्यवहार में बहुत परिवर्तन आ गया है I हरिजनों के मन में सवर्णों के प्रति जो दुर्भावना है वह सद्धू के मन में भी घर कर गया है I सत्ता का नशा तो बड़े-बड़े लोगों को भ्रष्ट बना देता है तो सद्धू अपढ़ और गँवार है I उसके भ्रष्ट होने में कितनी देर लगती I वह लगातार भ्रष्टाचार के दलदल में फँसता चला गया I बिना परिश्रम के मिले धन का परिणाम भी घातक होता है I जिस धन के लिए उसने इतनी बेईमानी की उसी धन के कारण उसकी जीवन-लीला समाप्त हो गई I सद्धू का पुत्र रामू भी पिता को देखकर शराब पीने लगा I उपन्यासकार ने लिखा है-
‘दो नंबर की कमाई अपने साथ बहुत बुराइयाँ भी लाती है I रामू भी दारू पीना सीख गया था, और अब अधिक पीने लगा था I उसका जमीर इतना मर गया था कि वह अब सद्धू के सामने भी पीने लगा था I’ दीनू ने सत्ता के नशे को नहीं चखा था I इसलिए अंत तक वह आदमी बना रहा I सच्चाई भी यही है कि सत्ता और राजनीति व्यक्ति को इंसान नहीं रहने देती, स्वार्थ में उसे अंधा कर देती है I राजनीति में रिश्तों का कोई महत्व नहीं है I राजनीति में कोई किसी का नहीं होता, सभी एक-दूसरे का इस्तेमाल करते हैं I स्वतंत्र भारत में जनप्रतिनिधियों के पद मलाईदार हो गए हैं I इसलिए उनको पाने की होड़ में रुपया पानी की तरह बहाए जाते हैं I
पेंशन और सरकारी सुविधा प्राप्त करने के लिए अनेक लोगों ने स्वतंत्रता सेनानी का फर्जी प्रमाणपत्र बनवा लिया I वास्तविक स्वतंत्रता सेनानियों ने सरकारी सुविधा लेने से इंकार कर दिया, लेकिन नकली स्वतंत्रता सेनानी सरकारी सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं I अनेक चोर-डकैत भी स्वतंत्रता सेनानी पेंशन ले रहे हैं जो अपराध के मामले में कारावास की सजा भुगत रहे थे I गजराज सिंह नकली स्वतंत्रता सेनानी थे I उन्होंने कहा-‘सब लोग जानते हैं कि मैं स्वतंत्रता सेनानी हूँ, पर यह सब झूठ है I हम लोगों का एक गिरोह था जिसमें पांडे और सरगाँव के पंडित और बहुत लोग थे I सन सैंतालीस में हम सब लोग एक डकैती के सिलसिले में जेल में बंद थे, सैंतालीस में देश आज़ाद हुआ, हम लोग बरी होकर स्वतंत्रता सेनानी बन गए I’
उपन्यास के कथोपकथन कथा को आगे बढ़ाते हैं और पात्रों के चरित्र को पारिभाषित करते हैं I निम्नलिखित संवाद के द्वारा भारतीय राजनीति का छल-प्रपंच और राजनेताओं की पदलिप्सा का पर्दाफाश किया गया है-
सद्धू को पता चला कि सोहन भी चुनाव लड़ रहा है तो उसका माथा ठनका I उसने गाँव पहुँच कर दीनू के पास जाकर पूछा-‘यह हम क्या सुन रहे हैं ?’
‘क्या सुन रहे हो ?’
‘कि सोहन चुनाव लड़ रहा है I’
‘बिल्कुल ठीक सुन रहे हो I’
‘उसे यह नहीं मालूम कि मैं चुनाव लड़ रहा हूँ I’
‘बिल्कुल मालूम है, क्या चुनाव लड़ने का ठेका अकेले तुम्हारे पास ही है ?’
‘नहीं ऐसा नहीं है, हम सोच रहे थे कि अबकी हम चुनाव लड़ लेते I’ सद्धू ने आहत होते हुए कहा I
‘यही हम भी सोच रहे हैं कि अबकी सोहन चुनाव लड़ ले I’
‘फिर ठीक है I’ सद्धू ने धमकाते हुए कहा I
उपन्यास की भाषा में प्रवाह है I उपन्यासकार ने सामान्य शब्दों के द्वारा कहानी का तानाबाना बुना है I इसमें कानपुर अंचल की भाषा और वाक्य-विन्यास का भरपूर उपयोग किया गया है जिसके कारण उपन्यास में स्थानीय रंग साकार हो उठा है I रोचकता और कथात्मकता ‘खंडित स्वप्न’ उपन्यास की प्राण वायु है I इस उपन्यास के पात्र कल्पना लोक के निवासी नहीं, बल्कि ये आम जन-जीवन से लिए गए हैं I इसलिए इन पात्रों में सभी मानवोचित दुर्बलताएं और स्खलन मौजूद हैं I यह औपन्यासिक कृति यथार्थ जीवन से प्रेरित है I उपन्यासकार ने जीवन की पाठशाला में बैठकर इस उपन्यास को आकार दिया है I स्वतंत्रता के बाद से लेकर समकालीन राजनीति को आधार बनाकर इस उपन्यास की रचना की गई है I इस उपन्यास में कांग्रेस द्वारा गढ़े गए झूठे विमर्श की पड़ताल की गई है एवं कांग्रेसी चाल-चरित्र को बेनकाब किया गया है I
पुस्तक-खंडित स्वप्न
लेखक-जयराम सिंह गौर
प्रकाशक-श्रीसाहित्य प्रकाशन, दिल्ली
वर्ष-2025
पृष्ठ-180
मूल्य-450/-
