ग़ज़ल
धर्म ख़तरे में है और न बंदगी ख़तरे में है
मज़हबी उन्माद से बस आदमी ख़तरे में है
रच रहे हैं साज़िशें जो ख़ुद चरागों के खिलाफ़
भाषणों में कह रहे हैं रोशनी ख़तरे में है
दौर का ये भी चलन था देखना बाकी अभी
हर ग़लत पलकों पे है अब हर सही ख़तरे में है
आ गया है गाँव जबसे अर्थ का छद्मी विकास
खेत जंगल ताल पर्वत हर नदी ख़तरे में है
जो था पहरेदार आमो ख़ास के अधिकार का
क्या सितम है अब वो पहरेदार ही ख़तरे में है
बादशाहत पा रही है जिस्म की कामुक कथा
बंदगी रूहानियत की शाईरी ख़तरे में है
बढ़ रही है जिस कदर बंसल लिविन वाली वबा
संस्कारों के चमन की हर कली ख़तरे में है
— सतीश बंसल
