कविता

ये इकट्ठे हो जायें

दिल न दिमाग है,
पर विज़न इनका साफ है,
चलेंगे औरों के इशारे पर,
भीख मांग सकते हैं द्वारे द्वारे पर,
सौ बार झूठ बोल उसे सच साबित करना है,
औरों को नहीं सुनना बस अपनी राह धरना है,
खुद किसी पर विश्वास नहीं करता
मगर कहता है मुझ पर विश्वास करो,
बैरपूर्ण व्यवहार और जाति सम्प्रदाय करना जरूरी है
तुम भी यहीं राह धरो,
अस्पृश्यता,छुआछूत,घृणित व्यवहार
हो रहा हो देश के किसी कोने में
ये कभी भी मुंह नहीं खोलते,
हो जाये पाखंड पर सार्थक चर्चा परिचर्चा
तत्काल ये उन्मादी रूप लेकर है बोलते,
सदव्यवहार और मानव मानव एक समान
की बातें क्या ये नहीं जानते?
विश्वबंधुत्व की बातें करेंगे जरूर
लेकिन अपने पड़ोसी को इंसान नहीं मानते,
ये छुपे रुस्तमों की आजमाइश है,
या कहें ये खास नस्ल की पैदाइश है,
ये मिल जाये कभी कहीं बिल्कुल मत उलझना,
हां ये दया के पात्र हैं बस इन्हें इतना ही समझना,
दुआ करो ये एक जगह इकट्ठे हो जाये,
न फैलें इंसानों के बीच और न गंदगी फैलायें।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554