क्रिसमस , ईसाई धर्म का पवित्र पर्व
25 दिसंबर को विश्वभर के ईसाई समुदाय क्रिसमस डे को यीशु मसीह के जन्मोत्सव के रूप में अत्यंत उत्साह और श्रद्धा से मनाते हैं, जो बाइबल के नए नियम के सुसमाचारों के अनुसार बेथलेहम शहर में एक साधारण अस्तबल में हुआ था जहां मरियम और यूसुफ के पुत्र के रूप में यीशु का अवतरण प्रेम, शांति और मानवता के उद्धार का प्रतीक बना, इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रोमन साम्राज्य के सूर्य देवता ‘सोल इन्विक्टस’ के जन्मोत्सव से जुड़ी है जिसे चौथी शताब्दी में पोप जूलियस प्रथम ने आधिकारिक रूप से यीशु जन्म की तिथि घोषित कर दी, चर्चों में मध्यरात्रि की विशेष प्रार्थना सभाएं, कैरोल गान की मधुर धुनें और मोमबत्ती जलाकर प्रार्थना करना प्रमुख परंपराएं हैं, क्रिसमस ट्री को जर्मन परंपरा से लिया गया सदाबहार पाइन का पेड़ रंगीन लाइट्स, सुनहरे स्टार, सजावटी गेंदों और उपहारों से सजाया जाता है जो आशा और नई शुरुआत का प्रतीक है, सैंटा क्लॉज या सेंट निकोलस की कथा चौथी सदी के तुर्की के संत से प्रेरित है जो बच्चों को गुप्त रूप से उपहार बांटते हैं और उत्तरी ध्रुव से स्लेज पर आते हैं, परिवारों में विशेष भोज में रोस्ट टर्की, प्लम पुडिंग, फ्रूट केक काटना और क्रिसमस कार्ड्स के माध्यम से शुभकामनाओं का आदान-प्रदान होता है, भारत में गोवा के चर्चों, दिल्ली के सैक्रेड हार्ट कैथेड्रल, कोझिकोड की सड़कों और मुंबई के होटलों में भव्य सजावट व लाइटिंग देखने को मिलती है जहां भाईचारे के साथ उत्सव मनाया जाता है।
— डॉ.मुश्ताक अहमद शाह सहज़
