गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

राज़ छिपे हैं परदे में,
लोग कईं हैं सदमे में।

सच्चा कैसे माने अब,
चेहरें हैं, इक चेहरे में।

प्रीत भरी है साजन की,
सपनों के गुलदस्ते में।

ज्ञान नहीं पर बच्चों के,
बोझ बढ़ा है बस्ते में।

छोड़ के सारा मालोज़र,
माँ रक्खी है हिस्से म़े।

शेर समझ में आएंगे,
उतरो थोड़ा गहरे में।

एक परिंदा उलझा है,
जाल,शिकारी,पिंजरे में।

रात ने अपने तारों को,
रक्खा दिन के पहरे में।

प’जय’ की ग़ज़लें भारी हैं,
आप न लेना हल्के में।

— जयकृष्ण चांडक ‘जय’

*जयकृष्ण चाँडक 'जय'

हरदा म. प्र. से