ग़ज़ल
कौन साथ वक्त के बदल नहीं गया
सूरज भी शाम होते ही क्या ढल नहीं गया
जाना जो उसे होता तो रुकता ही भला क्यों
आज क्या वो जाएगा जो कल नहीं गया
इज़्ज़त गई, सत्ता गई, अकड़ नहीं गई
रस्सी तो जल गई है मगर बल नहीं गया
अब भी कहीं कुछ हिस्सा उसका बाकी है मुझमें
दिल से गया सही वो मुकम्मल नहीं गया
ख़ुश न हुआ जो मेरी तरक्की पे तो क्या है
इतना ही क्या कम है वो मुझसे जल नहीं गया
— भरत मल्होत्रा
