महामना मालवीय सम्पूर्ण वाङ्मय : एक महान् विरासत
महामना पं. मदन मोहन मालवीय एक महान विभूति हैं। सामान्यतया लोग उनको केवल काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक के रूप में जानते हैं। कांग्रेस सरकारों द्वारा मात्र इतना ही प्रचारित किया गया था। परन्तु लोग यह नहीं जानते कि महामना का व्यक्तित्व बहुत व्यापक और बहुआयामी था। वे केवल शिक्षाशास्त्री ही नहीं, बल्कि वकील, राजनेता, पत्रकार, हिन्दी सेवी, धर्मयोद्धा और साहित्यकार के रूप में भी उन्होंने अपनी विलक्षण प्रतिभा की छाप समाज पर छोड़ी थी। इन सभी क्षेत्रों में उनका योगदान किसी भी अन्य व्यक्ति की तुलना में कम नहीं कहा जा सकता।
वे चार बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये थे। वे अनेक वर्षों तक लेजिस्लेटिव असेम्बली और लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य रहे थे। उन्होंने सदनों में अनेक बार अपने भाषणों से सभी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया था। जालियांवाला नरसंहार के खिलाफ तो वे पूरे 6 घंटों तक लगातार बोले थे। यह रिकार्ड अभी तक टूट नहीं पाया है और शायद आगे भी नहीं टूट पाएगा। यह बात जानबूझकर छिपायी गयी है कि सन् 1931 में पूना में गाँधी जी और डॉ. आम्बेडकर के बीच जो समझौता हुआ था, जिसे ‘पूना समझौता’ कहा जाता है, उसके पीछे वास्तव में महामना जी का ही परिश्रम था। सारी बातचीत महामना जी ने की थी और समझौते के दस्तावेजों पर उनके हस्ताक्षर प्रमुख रूप से हैं।
जलियांबाग वाला हत्याकांड के बाद महामना मालवीय जी ने ही तथ्य एकत्र करके अंग्रेजी सरकार के सामने जोरदार ढंग से रखे थे और उसे शर्मिन्दा होने पर मजबूर किया था.इसी प्रकार यह बात भी बहुत से लोग नहीं जानते कि चौराचौरी हत्याकांड के बाद उन्होंने आरोपियों की ओर से पैरवी की थी और कम से कम 150 लोगों को फाँसी के फंदे से बचाया था। उन्होंने कांग्रेस की ओर से सभी गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया था और अपनी प्रखर वाणी से अंग्रेजी सरकार को मनमानी करने से रोका था। उन्होंने कई पत्रिकाओं और समाचार पत्रों का भी सम्पादन और प्रकाशन किया था।
मालवीय जी सभी धर्मो का सम्मान करते थे, परन्तु जब 1946 में पं. बंगाल के नोआखली में मुस्लिम गुंडों ने हिन्दुओं की हत्याएँ कीं और नारियों पर बलात्कार आदि घोर अत्याचार किये, तो वे बहुत विचलित हुए। उस समय वे रोग शैया पर थे। वहीं से उन्होंने हिन्दुओं को संगठित होने और आततायियों का प्रतिरोध करने का आवाह्न किया था। उनका यह अन्तिम सन्देश ‘कल्याण’ पत्रिका ने छापा था, जिस पर अंग्रेजी सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था। अब यह उपलब्ध है।
यह आश्चर्य की बात है कि महामना जैसे महान् व्यक्तित्व को स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस की सरकारों ने पूरी तरह भुला दिया। सरकारों ने गाँधी, नेहरू, अम्बेडकर आदि कई नेताओं के सम्पूर्ण वाङ्मय प्रकाशित किये, परन्तु महामना वांगमय पर कोई ध्यान नहीं दिया। कांग्रेस सरकारों ने अनेक लोगों को ‘भारत रत्न’ सम्मान दिया, परन्तु महामना मालवीय जी को भूल गये। सन् 2014 में 25 दिसम्बर को मालवीय जयन्ती के दिन हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने उनको और अटल जी को ‘भारत रत्न’ देने की घोषणा की थी, जो मार्च 2015 में प्रदान किया गया।
उसी समय से महामना जी का सम्पूर्ण वाङ्मय प्रकाशित करने की बात उठी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को यह कार्य करना चाहिए था. परन्तु वहाँ भी अभी तक नहीं हुआ. तब ‘महामना मालवीय मिशन’ संस्था ने यह कार्य करने का बीड़ा उठाया। मिशन के कार्यकर्ताओं ने अथक परिश्रम करके इस वाङ्मय के लिए सामग्री एकत्र की। इस कार्य में उन्होंने अनेक राजघरानो तक से सम्पर्क करके उनका महामना जी के साथ हुआ पत्र-व्यवहार और चित्र आदि एकत्र किये। अनेक स्रोतों से महामना द्वारा लिखे गये लेख, भाषण आदि भी एकत्र किये गये। मिशन कार्यकर्ताओं और भारत सरकार के प्रकाशन विभाग के संयुक्त प्रयासों से कुल 23 खंडों में महामना मालवीय जी का सम्पूर्ण वाङ्मय प्रकाशित हुआ।
इनमें से पहले 11 खंडों का लोकार्पण मा. प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने अपने कर कमलों से 25 दिसम्बर 2023 को विज्ञान भवन में आयोजित भव्य समारोह में किया। बाद के 12 खंडों का लोकार्पण माननीय उपराष्ट्रपति श्री सी.पी. राधाकृष्णन के कर कमलों द्वारा विगत 25 दिसम्बर 2025 को दिल्ली में सम्पन्न हुआ। यह सम्पूर्ण वाङ्मय समाज की अमूल्य निधि है, जो सभी नागरिकों और विशेष रूप से शोधार्थियों के लिए बहुत उपयोगी है।
महामना मालवीय मिशन ने महामना जी पर शोध कार्य करने के लिए दिल्ली के ‘महामना स्मृति भवन’ में एक पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की भी स्थापना की है, जिसका भवन निर्माण कार्य प्रगति पर है। आईये हम महामना का निरंतर पुण्य स्मरण करते रहें।
— गोविन्द राम अग्रवाल
