इश्क में बगावत ठीक नहीं है
चुपचाप बहता
दिल का कोमल दरिया
शोर से डरता
इश्क की भाषा
आहिस्ता सी होती है
हुक्म नहीं माँगे
नज़रों की लय में
अगर तकरार आ जाए
रस सूख जाता
बगावत पल में
रिश्तों की जड़ हिलाए
विश्वास टूटे
इश्क सिखाता
थामे रहना हाथों को
न कि छुड़ा लेना
जहाँ सब्र पले
वहीं मोहब्बत टिके
ज़िद में नहीं प्रेम
समझ की धूप से
गलतफ़हमियाँ पिघलें
मन उजला हो
इश्क वही है
जो झुकना भी जान ले
अहं से ऊपर
— डॉ. अशोक
