लघुकथा

फीस और चंदा

दीदी,,आपसे एक बात कहनी थी”। मीनू ने अपनी मालकिन से कहा।*हां,बोल, मालकिन
सुरेखा ने कहा। मुझे थोड़े पैसे चाहिए थे,वो बेटी की फीस जमा करनी है,आप मेरे पगार में से काट लेना। सुरेखा कहने लगी- “तुझे तो बस पैसे ही चाहिए रहते हैं, पिछला एडवांस तो बड़ी मुश्किल से कटवाया तूने फिर शुरु हो गयी,अभी नहीं हैं मेरे पास पैसे वैसे “। मीनू मायूस हो गई और काम में लग गयी।
तभी डोर बेल बजी,और कुछ महिलाएं धड़धड़ाती अंदर आ गयी और कहने लगी, यार , सुरेखा वो चंदा के पैसे देना जरा, वो क्या है ना हम क्लब वाले कुछ पैसे जमाकर न्यू ईयर पार्टी मनायेंगे।” अब सुरेखा इन्हें कैसे मना कर सकती थी। उसने तुरंत ही एक हजार रुपए उनको पकड़ा दिए। मायूस मीनू सर झुकाकर फर्श पोंछने लगी।

— अमृता राजेंद्र प्रसाद

अमृता जोशी

जगदलपुर. छत्तीसगढ़