नए साल की दहलीज़ पर,बीते कल की विदाई और कल का आमंत्रण
मेरे बीते हुए कल और आने वाले कल के नाम, एक और साल दबे पाँव, चुपचाप रुखसत हो रहा है ,वो 2025 जो अभी-अभी आया था, अब अलविदा कहते हुए पीछे मुड़कर देखने को विवश कर रहा है। पीछे झाँकता हूँ तो यादों की लंबी कतार नहीं, बल्कि एक जीवंत जुलूस नजर आता है,खट्टी-मीठी हँसी, आंसुओं के नम रुमाल, अधूरे सपनों की स्याही से सने कागजात, और उन चेहरों की परछाइयाँ जो कभी अपने थे, कभी पराए हो गए। 2025 सिर्फ़ तारीखों का पलटना न था, बल्कि भीतर के तूफानों, शांतियों और परिवर्तनों का साक्षी रहा ,उसने दिखाया कि जीवन की किताब में हर पन्ना नया अध्याय लिखने का न्योता देता है।
पिछले साल ने गहरा सबक दिया कि कुछ चीज़ें हमारी कमज़ोरी से नहीं छूटतीं, बल्कि इसलिए छूटती हैं ताकि हम बेहतर के लिए जगह तलाश सकें,जैसे पुराना पेड़ कटे तो नई डालियाँ उगने का रास्ता बनता है। जो सपने अधूरे रह गए, वो शायद अभी कच्चे फल थे, जिन्हें पकने का और वक्त चाहिए था, जो रिश्ते रास्तों में बिछड़ गए, उन्होंने मुझे न सिर्फ़ अपनी अहमियत का एहसास कराया, बल्कि अकेले चलने का वो हौसला भी दिया जो किसी साथी से न मिलता। चुनौतियाँ आईं,आर्थिक तंगी की काली रातें, स्वास्थ्य की जद्दोजहद, और उन अपनों की खामोशी जो कभी आवाज थे—लेकिन हर काँटे ने सिखाया कि दर्द ही तो मरहम की पहचान बनाता है।
ऐ आने वाले 2026! मैं तुमसे कोई चमत्कार की उम्मीदें नहीं बाँधता, न स्वर्ग-सरीखी समृद्धि की कल्पना करता हूँ, बस इतनी सी गुजारिश है कि अपने साथ सुकून का आलम लाना,वो सुकून जो दिल को ठहरने दे, दिमाग को सोचने का मौका दे। हाँ, काँटे तो आएँगे ही, जीवन का यही तो स्वभाव है, लेकिन उनके साथ चलने का हौसला और घाव भरने वाला मरहम भी तो साथ लाना। जो ख्वाहिशें 2025 में ‘हसरत’ बनकर रह गईं,करियर की ऊँचाइयाँ, रचनात्मक उड़ानें, पारिवारिक एकजुटता,उन्हें इस साल ‘हक़ीक़त’ का जामा पहनाने की दुआ देना, ताकि वो शब्द कागज़ से निकलकर ज़िंदगी में साकार हों।
इस बार मैं सचमुच पुरानी कड़वाहटों को 2025 की दहलीज़ पर ही पटक आया हूँ,वो नाराज़गियाँ जो दिल में पनप रही थीं, वो ग़लतफ़हमियाँ जो रिश्तों को खा गईं, वो असफ़लताएँ जो आत्मविश्वास चुरा लेतीं,सबको अलविदा। मैं तैयार हूँ उन नए चेहरों के लिए जो अजनबी लगेंगे लेकिन अपने हो जाएँगे, उन नए रास्तों के लिए जो मेरी पहचान रचेंगे, और उन अप्रत्याशित खुशियों के लिए जो जीवन की किताब में अचानक उभर आती हैं। आओ, इस साल नई शुरुआत करें,रचनात्मकता को परवान चढ़ाएँ, स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें, और उन छोटी-छोटी जीतों को गले लगाएँ जो बड़े सपनों की सीढ़ी बनती हैं।
अलविदा 2025, तुम्हारी खट्टी-मीठी यादों के संग, जो दिल की डायरी में हमेशा संजोई रहेंगी।
खुशामदीद 2026, एक नई उम्मीद, ताजा मुस्कान और अनंत संभावनाओं के संग।
ख़्वाबों का मुसाफ़िर।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
