ग़ज़ल
जगह जगह पे मुझे बेहिजाब होना था,
इसी तरह से मेरा इंतिख़ाब होना था।
क़दम क़दम पे जहां इक गुलाब होना था,
कि उस जगह को भी इतना ख़राब होना था।
किसी दवा पे भी मुझको यकीं नहीं आता,
कहीं से कुछ तो ये कम इज़तिराब होना था।
नई जफ़ा का सितम आपने किया मुझ पर,
अभी तो आप से पहला हिसाब होना था।
जिसे मैं सीने पे रखकर ही सो गया होता,
किसी को प्यार की ऐसी किताब होना था।
कि मेहनतों से फ़क़त काम कब संवरते हैं,
सियासतों से भी वाक़िफ जनाब होना था।
— अरुण शर्मा साहिबाबादी
