सोच
माधव अपने बगीचे के आम बेचने आया मैं बाहर दलान में ही थी
“दीदी अपने बगीचे के बढ़िया दुधिया मालदा आम लेकर आया हूं आपने बेटियो के लिए ले जांऐ” माधव ने कहा
“अरे कहां – शहर के बच्चे इतना आम खाते है” मैंने कहा
“मेरे बगीचे के सबसे अच्छे आम है थोड़े कम पके हुए है
दो चार दिन में अच्छे से पक जाएगे “
“ठीक है रख दो और पैसे छोटे साहब से ले लेना”
“जी दीदी” माधव टोकरी रखकर चला गया ।
टोकरी को किचन में रखवाली और मैं अपने कामो में लग गई ,सोचा दो दिन बाद जब जाउगी तब ले जाउगी ।
सुबह सात बजे देहरादून की ट्रेन थी सो मैंने अपनी पैकिंग कर ली और नीलम से कहा “ये थैला ले जाओ और टोकरी के सारे आम इसमें डालकर ले आओ “
“लेकिन चाची सारे आम तो खत्म हो गऐ” नीलम ने कहा
“ऐसे कैसे खत्म हो गए मैंने तो देहरादून ले जाने को लिए थे ।” मुझे थोड़ा गुस्सा आ गया
“मैंने थोड़े खाऐ मां ने सारे भाईयो को खिला दिया ” नीलम ने बड़े भोलेपन से कहा
मैं भी कहां इस बच्ची से उलझ रही हूं चलकर भाभी से पूछ लूं । भाभी आंगन में बैठकर सब्जी काट रही थी
मैने जाते ही पूछा “माधव से जो टोकरी भर आम लिए थे वो कहां मुझे पैकिंग करनी है !”
“अरे वो तो सारे लडको ने खा लिए “उन्होने हंसते हुए कहा
“लेकिन मैंने तो देहरादून ले जाने को लिए थे “
“अरे बेटियों को खिलाकर क्या करोगी ? उन्हे क्या पहलवान बनाओगी ” हंसते हुए कहा
“कैसी बाते करती है बेटियां है तो क्या उनको खाने का हक नहीं है?” मैंने थोड़ा गुस्से में कहा
“ठीक ही तो कहा लड़कियों का क्या उसे कैसे भी पाल लो, जाना तो उन्हे दूसरे ही घर है ।” कंधा उचकाते हुए कहा
“छोडे इन बातों को आप में इतनी ही अक्ल होती तो आज रोशन और रोहित यूं आवारा न फिर रहे होते । अगर बेटो में सारी काबिलियत तो उनको कामयाब बनाती ।”
“अगर लड़के कुछ करते नही तो क्या हमारे बुढापे का सहारा है ।”बड़े गर्व से कहा
“जो खुद अपने सहारे खड़े नहीं है वो क्या बुढापे का सहारा बनेगा!” इतना कहकर मैं वहां चली आई, लेकिन उनकी इस मानसिकता पर मुझे अफसोस हो रहा था ।
— विभा कुमारी नीरजा
