हताश मन
चुभती है शूल सी दर्द भरी सर्द रातें,
किसको कहें हम अपनी सारी बातें,
जिंदगी का वो सुकून सारा है खोया,
उदास मन भीतर ही भीतर घंटों रोया ।
तिनका-तिनका हुए सुनहरे ख़्वाब सारे,
देखे थे जो मिलकर हमने संग में तुम्हारे,
तक़दीर में नहीं लिखा था अपना मिलना,
बाहर सर्द मौसम और भीतर यूॅं जलना ।
सूख गई मन की “आनंद” मधुमय धारा,
जीवन ने हमें दिया पीने को जहर खारा,
जिंदगी कहती कॉंटों में ही गुलाब खिलते,
बिछु़डने वाले फिर उस तरह नहीं मिलते ।
पर संभाले किस तरह इस हताश मन को,
ये समझना ही नहीं चाहता नए जीवन को,
अकेलेपन ने रातों को किया लम्बा बहुत,
हो गई अब से जिंदगी उबाऊ और सुस्त ।
— मोनिका डागा “आनंद”
