कविता

हताश मन

चुभती है शूल सी दर्द भरी सर्द रातें,
किसको कहें हम अपनी सारी बातें,
जिंदगी का वो सुकून सारा है खोया,
उदास मन भीतर ही भीतर घंटों रोया ।

तिनका-तिनका हुए सुनहरे ख़्वाब सारे,
देखे थे जो मिलकर हमने संग में तुम्हारे,
तक़दीर में नहीं लिखा था अपना मिलना,
बाहर सर्द मौसम और भीतर यूॅं जलना ।

सूख गई मन की “आनंद” मधुमय धारा,
जीवन ने हमें दिया पीने को जहर खारा,
जिंदगी कहती कॉंटों में ही गुलाब खिलते,
बिछु़डने वाले फिर उस तरह नहीं मिलते ।

पर संभाले किस तरह इस हताश मन को,
ये समझना ही नहीं चाहता नए जीवन को,
अकेलेपन ने रातों को किया लम्बा बहुत,
हो गई अब से जिंदगी उबाऊ और सुस्त ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु