बेतरतीब पन्ने
सूनी मेज़ पर
हवा पलटती पन्ने
स्याही ठिठकी
चाय की भाप में
अधूरे वाक्य तैरें
शाम धीमी
खिड़की के बाहर
पीपल की पत्ती
सुनती शब्द
काग़ज़ की धार
उँगली चुप काटे
याद जगे
दीपक की लौ
छाया लिखती है
अनकहा
रात के कोने
घड़ी साँस लेती
क्षण ठहरे
— डॉ. अशोक
