कहानी – ग्रहण
सेठानी ने सेठजी से पूछा -” खाना खा लिया। “
सेठजी गल्ले की चाभी दराज में रखते हुए बोले – ” नहीं। “
” अब खाकर क्या करोगे। अब तो ग्रहण लग गया है।”
” ग्रहण।”
“हूँ।”
” आज ग्रहण था। सात बजे से ही लगा हुआ है। तुमको नहीं पता। ” सेठानी।
” अरे , भाग्यवान मैं धँधे पानी वाला आदमी हूँ। दिन- भर खरीद बिक्री करे हूँ। टाईम कोनी। “
सेठजी ने अपनी व्यस्तता गिनवाई।
भादो की पूर्णमासी। पहाड़ों पर लगातार बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएँ हो रही थी। आदमी और जानवर सब परेशान थे। इस प्रलय जैसी हालत ने आदमी को उसकी औकात बता दी थी। पहाड़ों पर दस दिनों से लगातार मूसलाधार बारिश हो रही थी। पहाड़ भर-भराकर गिर रहे थे। जान बचाना मुश्किल था।
सडक पर निक्कू भिखारी और उसका कुत्ता भूख से बिलबिला रहे थे। कल से उन्होंने कुछ नहीं खाया था।
परसों तो गाँव में कहीं लँगर चल रहा था। भिखारी वहाँ खा आया था। वहाँ बाकी बचे जूठन को टोनी चट कर गया था।
लेकिन आज बहुत बारिश हुई थी। रात के दस बज रहे थे। निक्कू भिखारी और कुत्ता दोनोें समझ गए थे कि आज अब उन्हें खाना मिलने से रहा। लिहाजा लालटेन बुझाकर वो दोनोें कँबल में घुस गए थे। शरीर के एक- दूसरे से सटे होने के कारण उन दोनों को ऊष्मा मिल रही थी। गीली लकड़ियों के कारण झोपड़ी में धुँआ भर गया था। हाथ को गलाने वाली ठंड पड रही थी। कुदरत का कहर ही था कि दस दिनों की बारिश के बाद अब बर्फ भी पड़ने लगी थी। ये ठंड कोढ़ में खाज की तरह थी । बाल मुड़ाते ही ओले पडने की तरह।
कुत्ता और निक्कू भिखारी के पेट में कुछ नहीं था। दोनों का पेट चिपट गया था। निक्कू ने सोचा पेट दर्द कुछ कम हो सकता है। अगर थोड़ा पानी उबाल कर पी लिया जाए। लेकिन इसका उल्टा भी तो हो सकता है। खाली पेट होने की वजह से पेट ही दुखने लगे। दूसरी बात काहिलियत की थी। ठंड ने निक्कू को कर्तव्य हीन बना दिया था। ठंड तो बहुत बडी वजह थी ही । आदमी ठंड में अकर्मण्य हो ही जाता है।
ठंड ने जैसे निक्कू को जकड़ लिया था। कंबल से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी। दोनों सोच रहे थे। कहीं से कोई सूखी रोटी ही लाकर दे दे। कहीं से अगर पुराना सड़ा गला हुआ खाना भी मिल जाए तो नाक बँद करके वो भी खा लें दोनों। जिंदा रहना अभी चुनौती की तरह था उस रात। अच्छा कल मौसम अगर साफ हुआ तो कहीं लँगर में चलकर खाना खा लिया जाएगा। लेकिन कल तक जिंदा बचे तब तो।
” क्या करूँ निकाल दूँ खाना? ” सेठानी।
सेठजी -” हू़ँ कब बनाया था, खाना? “
सेठानी – ” शाम को ग्रहण से पहले। “
” तो कौन खाएगा अब । दोष लगेगा। ग्रहण के समय या उससे पहले बना भोजन दूषित हो जाता है। “
” क्या करूँ फेंक दूँ? माया भी लग रहा है। घी का हलवा बनाया था। शुद्ध देशी घी में! “
” अब दूषित भोजन कौन करेगा। फेंक दे बाहर। गाय खा जाएगी। “
सेठानी ने खिड़की के पल्ले
को खोला। और लिफाफे में लपेटकर हलवा सड़क पर फेंक दिया।
सेठ का ठिकाना ऊपर था। और निक्कू भिखारी की झोपड़ी उसके ठीक नीचे।
निक्कू के कुत्ते के पास आकर ही वो लिफाफा गिरा। टोनी भौं -भौं करता हुआ उधर लपका। थोड़ी देर तक लिफाफे को सूँघा। फिर लिफाफा उठाकर झोपड़ी में ले आया। लकड़ियों के जलने की वजह से झोपड़ी कुछ गर्म हो गई थी।
” ला बेटा ला। शाबाश बेटा! तु् कितना बहादुर है। बगैर ठंड की परवाह किए ही बाहर निकल गया। “
निक्कू ने लिफाफा खोलकर देखा। उसकी आँखें विस्मय से और बड़ी हो गईं। शाबाश बेटा। इसीलिए मैं तुझे अपने साथ लेता आया था। चाहता तो लिफाफा तू उधर ही फाड़कर खा लेता। इंसानों की तरह तू बेईमान नहीं निकला रे। तू जानवर होते हुए भी इंसानों से बेहतर है।” – और निक्कू ने टोनी को अपनी बाहों में भर लिया।
टोनी पूँछ हिलाने लगा। पूँछ हिलाकर वो अपनी स्वामी भक्ति का प्रदर्शन कर रहा था।
थोड़ी देर बाद वो कूँ-कूँ करके कुँकियाने लगा। बार- बार अपने पँजे पेट पर रगड़ रहा था। मानो कह रहा हो। मुझे भी भूख लगी है। खाना दो ।
” हाँ मालूम है। तूझे भूख लगी है। देता हूँ देता हूँ। थोड़ा सब्र कर। “
थोड़ी देर बाद उसने हलवा खाना शुरू कर दिया। तभी उसको उसका साथी गुल्लू झोपड़ी की तरफ आता दिखाई दिया।
” क्या गुल्लू ठंड लग रही है। “
” हाँ भैया मेरी दियासलाई अँधेरे में कहीं मिल नहीं रही है। एक बीड़ी सुलगानी थी।”
” ले ले धूरे में आग जल रही है। “
” क्या खा रहे हो भईया? “
” हलवा है खएगा? “
गुल्लू कुछ नहीं बोला। दिया -सलाई से बीड़ी सुलगाकर धुँआ नथूनों से छोड़ने लगा।
” नहीं भईया आज चँद्र ग्रहण है। मैनें शाम को ही खा लिया था। आप ग्रहण में क्यों खा रहें हैं दोष लगता है। “
” भाई भूख से बड़ा ग्रहण कोई नहीं होता है। भरे पेट वालों के लिए है ग्रहण । खाली पेट वालों के ऊपर तो हमेशा से ग्रहण लगा होता है। “
टोनी ने पूँछ हिलाकर निक्कू की बात का समर्थन किया। जैसे कह रहा हो मालिक ठीक कह रहें हैं।
— महेश कुमार केशरी
