ग़ज़ल
भर रही है लालसा हुंकार पैसों के लिये
बढ़ रही है हर तरफ़ तक़रार पैसों के लिये
भाँज कर विश्वास पर तलवार पैसों के लिये
कर रहा है आदमी हद पार पैसों के लिये
मत बदल अपना असल किरदार पैसों के लिये
बेच मत ईमान अपना चार पैसों के लिये
ज़िन्दगी भर तोड़ पाएगा नही इक बारगी
उठ गयी दिल में अगर दीवार पैसों के लिये
लग रही है देह की मंडी कहीं पर तो कहीं
हो रहा है धर्म का व्यापार पैसों के लिये
नूर तू किस ख़ानदां का है समझ इस बात को
बेच मत अजदाद की दस्तार पैसों के लिये
चाहता है चैन की रातें सुकूँ के दिन अगर
हक़ किसी मजलूम का मत मार पैसों के लिये
— सतीश बंसल
