कविता

तुझे पता है या…

दिखावा तेरे रग रग में है,
पल में कुछ अगले पल कुछ,
तुझे पता है या…
दिखना चाहता आधुनिक पर
हजारों सालों की सड़ांध से
प्यार करता है टूटकर,
दिखना चाहता है सभ्य लेकिन
बर्बरता नस नस में रखे हो,
तुझे पता है या…
कहते हो कि
दुनियादारी में अनाड़ी हो,
काइयां पन के बहुत बड़े खिलाड़ी हो,
जाति का गर्व जो है घमंड,
समय समय पर फूटता है प्रचंड,
कभी घड़ा छूने नहीं देते हो,
कभी कुआं या नल छूने नहीं देते हो,
परछाइयों से भी नफरत करते हो
कभी कभी मामूली बात पर जान ले लेते हो,
तुझे पता है या…
संपूर्ण हिस्सा खा लेने के बाद भी
स्वीकार नहीं करते हो,
इस कृत्य को हक़ कहते
बिल्कुल नहीं थकते हो,
सारा जहां मान चुका है पर
खुद स्वीकार नहीं पाते कि
सदियों से शोषक हो,
पाखंड, अन्धविश्वास, घमंड के
बहुत बड़े पोषक हो,
तुझे पता है या…
बेबसों की, अबलाओं की
आबरू उछालते हो,
घृणित हवस निकालते हो,
अचानक हो जाए यही तुम्हारे साथ
सारा गुबार क्रूरता से
बेकसूरों की ओर उछालते हो,
तुझे पता है या…
मैं तो अब यही मानूंगा कि
शोषक थे हो और रहोगे,
तुम्हारा यही किरदार अब तक जाना हूं।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554