कविता

भीड़ में अपराध करता है

भीड़ में अपराध करता है , अकेले में पश्चाताप।
धोने से कभी धुलते नहीं हैं, किये कर्म के पाप।
काम क्रोध मद लोभ मोह सब,मादकता की भीड़।
वश में पंछी पड़ा विचारा, ढूंढ रहा निज नीड़।
भीड़ में अपराध करता मन, हो जाता अनजान।
पर उस के हर लेख लिखे हैं, देख रहा भगवान।
इक दिन तो यह सजा मिलेगी, झेलेगा संताप।
भीड़ में अपराध करता है , अकेले में पश्चाताप।
देख रही है आंख ईश की, तेरे यहाॅं हिसाब।
जो करता है भरे यहीं पर, खेले जितने दाव।
नींदा चुगली जितनी करले, द्वेष वैर अरु खार।
जितना सुच्चा बन के दिखता, पड़ती उतनी मार।
पाप सदा ही सामने आता, भीतर रोता आप।
भीड़ में अपराध करता है , अकेले में पश्चाताप।
गुरु के चरण पकड़ के बैठो, होगा मन यह शांत।
करना सिमरन राम नाम का, बैठ कहीं एकांत।
धुल जाती है मैल सदा ही, कर ईश्वर का ध्यान।
भीड़ में अपराध छूटेंगे, निर्मल मन को जान।
छोड़ दीजिए दुनियादारी, करो राम का जाप।
भीड़ में अपराध करता है , अकेले में पश्चाताप।

— शिव सन्याल

*शिव सन्याल

नाम :- शिव सन्याल (शिव राज सन्याल) जन्म तिथि:- 2/4/1956 माता का नाम :-श्रीमती वीरो देवी पिता का नाम:- श्री राम पाल सन्याल स्थान:- राम निवास मकड़ाहन डा.मकड़ाहन तह.ज्वाली जिला कांगड़ा (हि.प्र) 176023 शिक्षा:- इंजीनियरिंग में डिप्लोमा लोक निर्माण विभाग में सेवाएं दे कर सहायक अभियन्ता के पद से रिटायर्ड। प्रस्तुति:- दो काव्य संग्रह प्रकाशित 1) मन तरंग 2)बोल राम राम रे . 3)बज़्म-ए-हिन्द सांझा काव्य संग्रह संपादक आदरणीय निर्मेश त्यागी जी प्रकाशक वर्तमान अंकुर बी-92 सेक्टर-6-नोएडा।हिन्दी और पहाड़ी में अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। Email:. Sanyalshivraj@gmail.com M.no. 9418063995