भीड़ में अपराध करता है
भीड़ में अपराध करता है , अकेले में पश्चाताप।
धोने से कभी धुलते नहीं हैं, किये कर्म के पाप।
काम क्रोध मद लोभ मोह सब,मादकता की भीड़।
वश में पंछी पड़ा विचारा, ढूंढ रहा निज नीड़।
भीड़ में अपराध करता मन, हो जाता अनजान।
पर उस के हर लेख लिखे हैं, देख रहा भगवान।
इक दिन तो यह सजा मिलेगी, झेलेगा संताप।
भीड़ में अपराध करता है , अकेले में पश्चाताप।
देख रही है आंख ईश की, तेरे यहाॅं हिसाब।
जो करता है भरे यहीं पर, खेले जितने दाव।
नींदा चुगली जितनी करले, द्वेष वैर अरु खार।
जितना सुच्चा बन के दिखता, पड़ती उतनी मार।
पाप सदा ही सामने आता, भीतर रोता आप।
भीड़ में अपराध करता है , अकेले में पश्चाताप।
गुरु के चरण पकड़ के बैठो, होगा मन यह शांत।
करना सिमरन राम नाम का, बैठ कहीं एकांत।
धुल जाती है मैल सदा ही, कर ईश्वर का ध्यान।
भीड़ में अपराध छूटेंगे, निर्मल मन को जान।
छोड़ दीजिए दुनियादारी, करो राम का जाप।
भीड़ में अपराध करता है , अकेले में पश्चाताप।
— शिव सन्याल
