डिजिटल मीडिया और किशोरियों का मानसिक स्वास्थ्य : अवसर, दबाव और हमारी जिम्मेदारी
डिजिटल युग ने संवाद, अभिव्यक्ति और अवसरों की दुनिया को अभूतपूर्व विस्तार दिया है। आज की किशोरियाँ उस पीढ़ी का हिस्सा हैं जिसने बचपन से ही स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म को जीवन का सामान्य हिस्सा माना है। शिक्षा, रचनात्मकता, संवाद और आत्म-अभिव्यक्ति के नए अवसर खुले हैं; लेकिन इसके साथ ही मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी जटिल चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। प्रश्न यह नहीं है कि डिजिटल मीडिया अच्छा है या बुरा; प्रश्न यह है कि उसका प्रभाव किस प्रकार और किस सीमा तक किशोरियों के मन, आत्मसम्मान, संबंधों और भविष्य दृष्टि को प्रभावित कर रहा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, किशोरावस्था मानसिक स्वास्थ्य के विकास की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील चरण है, और वैश्विक स्तर पर लगभग 10–19 आयु वर्ग के प्रत्येक सात में से एक किशोर किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से प्रभावित है। यह आँकड़ा केवल चिकित्सा संबंधी स्थिति का संकेत नहीं, बल्कि उस सामाजिक परिवेश की जटिलता को भी दर्शाता है जिसमें किशोर बढ़ रहे हैं। डिजिटल मीडिया इस परिवेश का एक प्रमुख घटक बन चुका है।
भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 800 मिलियन से अधिक बताई जाती है, और किशोर आयु वर्ग में स्मार्टफोन की पहुँच तीव्र गति से बढ़ी है। यूनिसेफ और अन्य संगठनों की रिपोर्टें यह दर्शाती हैं कि डिजिटल माध्यम अब शिक्षा और सामाजिक संपर्क का प्रमुख साधन बन चुका है। कोविड-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन शिक्षा के कारण स्क्रीन समय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) ने भी यह संकेत दिया कि किशोरियों के जीवन में डिजिटल साधनों की भूमिका बढ़ रही है, यद्यपि पहुँच में शहरी-ग्रामीण और लैंगिक अंतर अभी भी मौजूद है।
डिजिटल मीडिया का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि यह किशोरियों को सूचना और सीखने के अवसर देता है। स्वास्थ्य, करियर, विज्ञान, कला और उद्यमिता से संबंधित सामग्री अब आसानी से उपलब्ध है। कई किशोरियाँ ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से अपनी प्रतिभा प्रदर्शित कर रही हैं—चाहे वह लेखन हो, संगीत हो, कला हो या तकनीकी कौशल। डिजिटल माध्यम ने उन्हें संवाद का ऐसा मंच दिया है जहाँ वे समान रुचियों वाले समूहों से जुड़ सकती हैं, अपनी बात रख सकती हैं और प्रेरणा प्राप्त कर सकती हैं।
लेकिन इसी डिजिटल दुनिया का एक दूसरा पक्ष भी है, जो मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में गंभीर चिंता का विषय है। अनेक अंतरराष्ट्रीय शोधों ने यह पाया है कि अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग और अवसाद, चिंता तथा आत्मसम्मान में कमी के बीच संबंध देखा गया है। उदाहरण के लिए, अमेरिकी सर्जन जनरल की 2023 की सलाह में यह कहा गया कि किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया के प्रभाव को लेकर पर्याप्त चिंताएँ मौजूद हैं और प्लेटफ़ॉर्म की डिज़ाइन उपयोगकर्ताओं को लंबे समय तक जुड़े रहने के लिए प्रेरित करती है। भारत में भी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बढ़ते स्क्रीन समय और किशोरियों में चिंता तथा नींद संबंधी समस्याओं के बीच संबंध की ओर संकेत किया है।
किशोरियाँ विशेष रूप से सोशल तुलना के दबाव से प्रभावित होती हैं। सोशल मीडिया पर प्रदर्शित “आदर्श” शरीर, जीवनशैली और सफलता की छवियाँ अक्सर वास्तविकता से दूर होती हैं, परंतु किशोर मन उन्हें सच मानकर स्वयं की तुलना करने लगता है। इससे आत्मसम्मान में कमी, शरीर के प्रति असंतोष और अवसाद की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2015-16) ने यह बताया कि भारत में किशोर आयु वर्ग में मानसिक विकारों की उपस्थिति नगण्य नहीं है; हालाँकि यह सर्वेक्षण डिजिटल प्रभाव पर केंद्रित नहीं था, परंतु वर्तमान संदर्भ में विशेषज्ञ इस बात पर बल देते हैं कि डिजिटल दबाव मानसिक स्वास्थ्य कारकों में एक नया आयाम जोड़ रहा है।
ऑनलाइन उत्पीड़न या साइबर बुलिंग एक गंभीर समस्या के रूप में उभरी है। किशोरियाँ अक्सर ट्रोलिंग, अपमानजनक टिप्पणियों, छेड़छाड़ या फर्जी प्रोफ़ाइल के माध्यम से परेशान की जाती हैं। NCRB के आँकड़ों में साइबर अपराधों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है, जिनमें महिलाओं और किशोरियों के खिलाफ ऑनलाइन अपराध भी शामिल हैं। साइबर बुलिंग का प्रभाव केवल क्षणिक नहीं होता; यह आत्मविश्वास, सामाजिक जुड़ाव और शैक्षणिक प्रदर्शन पर दीर्घकालिक असर डाल सकता है।
नींद की कमी भी एक उभरती हुई समस्या है। देर रात तक मोबाइल उपयोग, नोटिफिकेशन की निरंतरता और डिजिटल सामग्री की लत किशोरियों की जैविक घड़ी को प्रभावित करती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और विभिन्न बाल-स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह मानते हैं कि पर्याप्त नींद किशोर मानसिक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। नींद में कमी से चिड़चिड़ापन, ध्यान की कमी और भावनात्मक असंतुलन की संभावना बढ़ जाती है।
डिजिटल मीडिया का प्रभाव पारिवारिक संबंधों पर भी पड़ता है। यदि संवाद का स्थान स्क्रीन ले लेती है, तो भावनात्मक साझेदारी कम हो सकती है। किशोरियाँ कभी-कभी अपनी समस्याएँ परिवार से साझा करने के बजाय ऑनलाइन मित्रों या अपरिचित लोगों से साझा करती हैं, जो जोखिमपूर्ण हो सकता है। वहीं दूसरी ओर, डिजिटल माध्यम परिवारों को संवाद का नया अवसर भी दे सकता है, यदि उसका उपयोग संतुलित और रचनात्मक ढंग से किया जाए।
यह समझना आवश्यक है कि डिजिटल मीडिया स्वयं समस्या नहीं है; समस्या उसके अनियंत्रित और असंतुलित उपयोग में है। अनुसंधान यह भी दिखाते हैं कि मध्यम और उद्देश्यपूर्ण उपयोग—जैसे शैक्षिक सामग्री देखना, रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेना या सकारात्मक समुदायों से जुड़ना—मानसिक स्वास्थ्य के लिए सहायक हो सकता है। अतः समाधान “प्रतिबंध” नहीं, बल्कि “डिजिटल साक्षरता” और “भावनात्मक शिक्षा” में निहित है।
विद्यालयों की भूमिका यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। जीवन कौशल शिक्षा, भावनात्मक साक्षरता और डिजिटल सुरक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। किशोरियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली छवियाँ संपादित और चयनित होती हैं, वास्तविकता का पूर्ण चित्र नहीं। उन्हें यह भी समझाया जाना चाहिए कि साइबर बुलिंग की स्थिति में क्या कानूनी और संस्थागत सहायता उपलब्ध है।
परिवारों को भी संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा। अत्यधिक नियंत्रण या पूर्ण स्वतंत्रता—दोनों ही चरम स्थितियाँ हैं। संवाद, विश्वास और उदाहरण के माध्यम से डिजिटल अनुशासन विकसित किया जा सकता है। यदि माता-पिता स्वयं भी लगातार स्क्रीन में डूबे रहें, तो बच्चों से संयम की अपेक्षा करना कठिन हो जाता है। सामूहिक नियम—जैसे भोजन के समय स्क्रीन से दूरी या सोने से पहले डिजिटल विराम—स्वस्थ आदतें विकसित कर सकते हैं।
नीति स्तर पर भी पहल आवश्यक है। डेटा संरक्षण, साइबर अपराध की त्वरित जाँच और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म की जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है। भारत में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और किशोर संरक्षण कानून मौजूद हैं, परंतु जागरूकता और क्रियान्वयन की निरंतर समीक्षा आवश्यक है। डिजिटल कंपनियों को भी यह समझना होगा कि किशोर उपयोगकर्ता केवल “उपभोक्ता” नहीं, बल्कि संवेदनशील आयु वर्ग के नागरिक हैं।
अंततः, डिजिटल मीडिया और किशोरियों के मानसिक स्वास्थ्य का संबंध जटिल और बहुआयामी है। इसमें अवसर भी हैं और जोखिम भी। यदि हम इसे संतुलित, जागरूक और संवेदनशील दृष्टिकोण से देखें, तो डिजिटल माध्यम सशक्तिकरण का साधन बन सकता है। परंतु यदि हम केवल तकनीकी विस्तार को प्रगति मान लें और मानसिक स्वास्थ्य को गौण कर दें, तो परिणाम दीर्घकालिक और गंभीर हो सकते हैं।
समाज के रूप में हमारी जिम्मेदारी है कि हम किशोरियों को केवल डिजिटल उपकरण न दें, बल्कि डिजिटल विवेक भी दें; केवल सूचना न दें, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा भी दें; केवल स्वतंत्रता न दें, बल्कि मार्गदर्शन भी दें। सुरक्षित डिजिटल वातावरण, संवेदनशील पारिवारिक संवाद और सुदृढ़ मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ—इन तीनों के संतुलन से ही हम उस पीढ़ी का निर्माण कर सकते हैं जो तकनीकी रूप से दक्ष होने के साथ-साथ भावनात्मक रूप से भी सशक्त हो।
किशोरियाँ हमारे समाज का वर्तमान भी हैं और भविष्य भी। डिजिटल दुनिया उनके हाथ में है; अब यह हम पर निर्भर है कि हम उन्हें उस दुनिया में संतुलन, आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य के साथ आगे बढ़ने की दिशा दे सकें।
— पूनम चतुर्वेदी शुक्ला
