सामाजिक

सबसे खूबसूरत पन

हम जब भी छोटे बच्चों को देखते हैं तो कहते है कि जीवन का सबसे खूबसूरत पन बचपन होता है l कोई चिंता कोई फ़िक्र नहीं होती l जब जी चाहा खाया,जब जी चाहा सोया और अपने मन की चीज चाहने की जिद की l सामान्य परिस्थितियों में वो चाहत अक्सर पूरी भी हो जाती है l पर जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं हमारा अल्हड़पन धीरे-धीरे गायब होने लगता है l जब कोई बच्चा जन्म लेता है तो उसकी इच्छाएं मात्र प्राकृतिक आवश्यकताओं तक सीमित होती हैं, प्राकृतिक क्रियाओं के बाद धीरे-धीरे उसकी मनोरंजन की आवश्यकता प्रकट होती है परन्तु यह अनिवार्य नहीं कि उसे किसी खास तरह के खिलौनों की आवश्यकता हो ।उसके लिए मिटटी भी खिलौना हो सकती है वह जो कुछ अपने आस-पास देखता है उसे ही जिज्ञासावश छूता है , महसूस करता है और अपना मनोरंजन करता है l बालपन की जो सबसे आकर्षक प्रवृत्ति है वह है,उसकी बेफिक्री,उसका मस्तानापन l ये बेफिक्री जीवन में हमेशा ही एक बार फिर से प्रत्येक व्यक्ति के भीतर बच्चा बन जाने की इच्छा बनाये रखने के लिए मजबूर कर देती है l तभी सुदर्शन फाक़िर लिखते हैं , ‘ ये दौलत भी ले लो ये शोहरत की ले लो, भले छीन लो मुझ से मेरी जवानी ; मगर मुझ को लौटा दो वो बचपन का सावन … . . .वो बचपन ऐसा है कि उसको फिर से पाने के लिए एक बार सब कुछ लुटा देने को जी चाहता है।एक बच्चे की सबसे अद्भुत शक्ति होती है उसके भीतर बसने वाला असीम विश्वास,ऐसा विश्वास जो उसे कभी उदास नहीं होने देता।अगर वो एक पल रोता है तो दूसरे ही पल फिर हंसकर अपने खेल में लग जाता है। बच्चा या तो हंसता है या रोता है उदास नहीं होता।उसे जैसे कोई चिंता ही नहीं होती कुछ खोने की ।वो क्या खोएगा उसके पास कुछ होता ही नहीं और जिस समय जो होता है उसे ही वो अपना सर्वस्व मान लेता है।आप कभी ध्यान से किसी छोटे बच्चे को खेलते हुए देखें तो आप पाएंगे कि अगर वो किसी एक खिलौने से खेल रहा है और उसे कोई दूसरा खिलौना मिल जाता है कहीं से , तो वो पहला वाला छोड़कर दूसरे को खेलने में लग जाता है।वो यह बिल्कुल नहीं सोचता कि पहले वाले खिलौने को जाकर कहीं छुपा दूं,या ताले में बंद कर दूं उसके बाद दूसरे से खेलूं।वो सहज ही पहले को छोड़ता है और दूसरे से अपनी जिज्ञासा शांत करने में लग जाता है। अर्थात् वो पूरी तरह से वर्तमान में जीता है न तो वो पहले वाले खिलौने को याद करता है और न ही यह सोचता है कि अब उसे अगला कौन सा खिलौना मिलने वाला है।जब उसे किसी चीज की जरूरत होती है तो सब कुछ छोड़कर रोना शुरू कर देता है,उसके पूरा होते ही वो रोना भूलकर फिर खेलने लगता है। उसे इस बात का भी दुख नहीं होता कि उसे रोना पड़ा। .उसके पास अहंकार नहीं होता जिसे रोने से या किसी से गुहार लगाने में चोट महसूस हो।इसके विपरीत अगर हम अपनी बात करें तो हमारी स्थिति बिल्कुल इसके उलट है। हम अपने दिन का ज्यादातर हिस्सा फिक्र करने और उदास रहने में बिता देते हैं।हम या तो अतीत के दुखों में डूबे रहते हैं या भविष्य की चिंता में। वर्तमान के सूरज की रोशनी हम पर उतना प्रकाश नहीं डाल पाती जितना बीत चुकी रात या आने वाली रात का अंधेरा हमें खुद में डुबोए रखता है।इस चिंता के पीछे वास्तव में हमारा अपना अहंकार होता है जो हमें सब कुछ का नियंता मानने और अपने नियंत्रण में रखने को प्रेरित करता है। हम न केवल अपने जीवन को नियंत्रित करना चाहते हैं बल्कि उससे भी आगे बढ़कर अपने परिवार के लोगों, दोस्तों, पड़ोसियों पर भी अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं । गौर से विश्लेषण करने पर ये पता चलेगा कि जीवन में रहने वाला अधिकतर तनाव हमें अपनी जीवनरूपी गाड़ी को नियंत्रित करने से नहीं मिलता बल्कि सबकी गाड़ी के रिमोट कंट्रोल को हासिल करने की कोशिश में लगे रहने से मिलता है।हम मुट्ठी बांधकर आते हैं इस संसार में और हाथ पसारकर चले जाते हैं । वास्तव में प्रकृति , जीवन की शुरुआत और अंत के बीच एक यात्रा की मंजिल शुरू से ही तय कर देती है। मतलब हम बंधकर आते हैं और हमें मुक्त होकर जाना है । जीवन वास्तव में बंधन से मुक्ति की यात्रा है । और इस यात्रा में हमारे जीवन रूपी रथ का सारथी है, ईश्वर । वो ईश्वर जिसे देख नहीं सकते , लेकिन वो सृष्टि के कण- कण में है ठीक वैसे ही जैसे दूध में मक्खन और घी व्याप्त होते हुए भी आंखों से दिखाई नहीं देता है । दूध में मक्खन और घी इसलिए अदृश्य नहीं होता कि वो वहाँ उपस्थित नहीं है बल्कि इसलिए होता है कि उसे देख पाने की क्षमता हमारी आंखों में नहीं है।जिस तरह एक छोटा बच्चा अपने माता – पिता पर स्वयं से ज्यादा विश्वास करता है और किसी भी तरह की चिंता से मुक्त रहता है , ठीक वैसे ही मनुष्य को भी ईश्वर पर विश्वास रखते हुए कर्म करना चाहिए । प्रकृति हमें उन्हीं संसाधनों से विराजती है जिसकी हम पात्रता रखते हैं। इसलिए हमारे सारे कर्म और हमारी सारी ऊर्जा अपनी पात्रता को बढ़ाने और बनाये रखने में लगनी चाहिए ।ईश्वर हमारी वैसे ही चिंता करता है जैये माता-पिता अपने बच्चों की करते हैं । जिस तरह वो अपने अभी बच्चों को समान परवरिश और समान संसाधन देना चाहते हैं और यथाशक्ति देते भी हैं । लेकिन एक ही माता-पिता की हर संतान अपने जीवन में अलग- अलग मंजिलें तय करती है।ठीक उसी तरह हर मनुष्य को प्रकृति ने जीवन दिया है और उसे आकार देने वाले संसाधन भी । सबकी अपनी यात्रा है और जीवन के स्थूल लक्ष्य भी भिन्न हैं लेकिन प्रकारांतर से मंजिल सबकी एक है । हमें सब पाना है , खेलना है, सीखना है और उसे किसी और के लिए छोड़ते जाना है । समेटने में अपनी ऊर्जा नहीं गंवानी है क्योंकि तब बहुत से खिलौने अछूते रह जाएंगे और हम तमाम नई सीखों से वंचित रह जाएंगे ।

लवी मिश्रा

कोषाधिकारी, लखनऊ,उत्तर प्रदेश गृह जनपद बाराबंकी उत्तर प्रदेश