गीतिका/ग़ज़ल

आजकल

फुर्सत कहाँ किसी को किसी के लिए यहाँ,
मस्त हैं सब अपने-अपनों में ही आजकल।

दौर आया कुछ ऐसा इस कलयुग का देखो,
हर कोई है बेख़बर, बेक़दर सा आजकल।

रिश्ते भी अब बनते हैं सोच-समझ कर यूँ,
कब, कहाँ, किससे क्या काम पड़ जाए आजकल।

चेहरों पर मुस्कान है, दिलों में हिसाब छुपा,
हर बात में मतलब का असर है आजकल।

चंद लम्हों की चाहत, और सालों की दूरी,
रिश्तों का भी अजीब सफ़र है आजकल।

— मुनीष भाटिया

मुनीष भाटिया

जन्म स्थान : यमुनानगर (हरियाणा) उपलब्धियां: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख एवं कविताएँ I प्रकाशन: चार कविता संग्रह एवं तीन निबंध संग्रह, तीन quote बुक्स राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की दस हजार से अधिक पत्र पत्रिकाओं में वर्ष 1989 से निरंतर प्रकाशन I 5376, एरोसिटी, ऍफ़ ब्लाक, मोहाली -पंजाब M-7027120349 munishbhatia122@gmail.com