सामाजिक

भारत में सामाजिक न्याय और समतामूलक विकास : एक नवीन सामाजिक विमर्श

आज सामाजिक न्याय केवल एक आदर्श वाक्य नहीं रहा — यह वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिकता, नीति तथा समावेशी कार्रवाई का विषय बन चुका है। 20 फरवरी को विश्व सामाजिक न्याय दिवस के अवसर पर यह स्पष्ट रूप से रेखांकित होता है कि भारत को गरीबी, बेरोज़गारी, लैंगिक असमानता और सामाजिक बहिष्कार से निपटने के लिये ठोस, दीर्घकालिक और समग्र रणनीतियाँ अपनानी होंगी। (जैसा कि लाइव7 टीवी ने 2026 के दिवस की थीम की व्याख्या करते हुए बताया है कि यह दिवस “सामाजिक विकास और सामाजिक न्याय के प्रति नवीकृत प्रतिबद्धता” पर केंद्रित है)।

सामाजिक न्याय की दिशा में पहला मूलभूत घटक है गरीबी से मुक्ति और जीवन-स्तर के सुधार। विश्व बैंक की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार भारत में चरम गरीबी दर में उल्लेखनीय गिरावट आई है: 2011-12 में जहां चरम गरीबी लगभग 27.1 प्रतिशत थी, वहीं 2022-23 में यह केवल लगभग 5.3 प्रतिशत तक पहुँच गई, और इसके पीछे परिवारों की सामाजिक सुरक्षा नेटवर्क तथा घरों की आर्थिक क्षमता में सुधार को प्रमुख कारण माना गया है। यह आंकड़ा समान अवसर निर्माण और न्यूनतम जीवन-स्तर सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ी प्रगति का संकेत देता है।

मुख्य आर्थिक सूचकांक पर गौर करें तो भारत का बेरोज़गारी दर 3.2 प्रतिशत तक गिर गई है, जैसा कि पीरियाडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के नवीनतम परिणाम बताते हैं। यह पिछले वर्षों की बेरोज़गारी दर (लगभग 6 प्रतिशत) की तुलना में बेहतर स्थिति दर्शाता है और सामाजिक स्थिरता के लिये सकारात्मक संकेत प्रदान करता है। हालांकि यह संख्या सामाजिक न्याय की दिशा में प्रगति का संकेत देती है, इसका यह अर्थ नहीं है कि रोजगार समस्याएँ समाप्त हो गईं हैं — गुणवत्तापूर्ण रोज़गार, कौशल-आधारित कार्य अवसर और युवा श्रमिकों के लिये रोजगार संतुलन आज भी महत्वपूर्ण चुनौतियाँ बनी हुई हैं।

जहाँ गरीबी और बेरोज़गारी के आंकड़े सकारात्मक सुधार दिखा रहे हैं, वहीं लैंगिक असमानता समावेशन के अन्तर्गत एक वास्तविक चुनौती बनी हुई है। वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक 2025 के नवीनतम विश्लेषण में भारत का रैंक 131 में दर्ज हुआ है, जो बताता है कि आर्थिक भागीदारी, अवसरों की समानता तथा राजनीतिक सशक्तिकरण में अभी भी भारी अंतर मौजूद है। यह रैंकिंग पिछले वर्षों में थोड़े सुधार के बावजूद दक्षिण एशिया के सबसे निचले स्तर के देशों की श्रेणी में बनी हुई है। इन सूचकांकों का संदर्भ सामाजिक न्याय की व्यापक परिकल्पना में बहुत महत्वपूर्ण है। सामाजिक न्याय केवल राज्य और कानूनों का विषय नहीं है, बल्कि इसका अर्थ यह सुनिश्चित करना है कि देश की प्रत्येक नागरिक को रोज़गार, समान अवसर, जीवन-स्तर, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामाजिक पहचान का अधिकार समान रूप से मिले। भारत के संविधान में समानता, अवसर और मानवीय गरिमा का प्रावधान स्पष्ट रूप से निहित है, परंतु लैंगिक असमानता, क्षेत्रीय विषमताएँ और सामाजिक पूर्वाग्रह अभी भी इन अधिकारों के क्रियान्वयन को प्रभावित करते हैं।

समाज में विविधता के बीच समता की आवश्यकता विशेष रूप से तब स्पष्ट होती है जब हम शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की विभाजन-संबंधी असमानताओं को देखते हैं। दिल्ली सरकार की 75 “सीएम श्री स्कूल” पहल का ताज़ा उदाहरण इसका सकारात्मक पक्ष दर्शाता है, जहाँ तकनीकी उपकरण, डिजिटल सीखने के अवसर और कौशल-आधारित विकास को प्राथमिकता दी जा रही है ताकि छात्रों को बाजार-अनुकूल शिक्षा प्राप्त हो सके। हालांकि इस प्रकार की पहल नए अवसर प्रदान करती है, इससे जुड़े तमाम प्रशिक्षण, शिक्षक कौशल, सामुदायिक पहुँच और तकनीकी संरचना जैसे पक्षों को संतुलित करना अभी भी आवश्यक चुनौती बनी हुई है।

सामाजिक न्याय की दिशा में महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा को भी केंद्र में रखना आवश्यक है। उत्तर प्रदेश में महिला छात्रावासों के निर्माण की प्रक्रिया, जहाँ 4000 कामकाजी महिलाओं के लिये सुरक्षित आवासीय सुविधाएँ विकसित की जा रही हैं, इसका सीधा परिणाम लैंगिक सुरक्षा, रोजगार अवसरों की स्थिरता और सामाजिक सम्मान की दिशा में सकारात्मक परिवर्तन की ओर माना जा सकता है। सामाजिक न्याय का एक और पहलू है श्रमिकों और कमजोर वर्गों का सामाजिक सुरक्षा नेटवर्क। आज विश्व सामाजिक न्याय दिवस पर यह मुद्दा और भी प्रासंगिक हो जाता है क्योंकि सिर्फ गरीबी में कमी ही पर्याप्त नहीं है; जनता को न्यायसंगत सामाजिक सहायता, शिक्षा तक समान पहुंच, स्वास्थ्य सुरक्षा और समावेशी विकास का अवसर भी उपलब्ध होना आवश्यक है। झारखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में सामाजिक आर्थिक अंतर आज भी स्पष्ट है, और इन राज्यों में मूलभूत सुविधाओं की गुणवत्ता और पहुंच में सुधार करना आवश्यक है—यह नीतिगत प्राथमिकता का विषय है।

सामाजिक न्याय तभी सशक्त रूप से लागू हो सकता है जब नीति-निर्माण में सामाजिक न्याय के मूल्य को राष्ट्रीय लक्ष्यों के समान महत्व दिया जाए। यह बच्चों के शिक्षा के अधिकार, महिलाओं के समान अवसर और सुरक्षा, वृद्धों के सामाजिक सम्मान, दलितों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिये समावेशन, और लैंगिक समानता जैसे मूलभूत विषयों को सुनिश्चित करने में परिलक्षित होता है। आज विश्व सामाजिक न्याय दिवस के अवसर पर यह याद रखना आवश्यक है कि गरीबी और बेरोज़गारी के आंकड़ों में कमी, और कार्यक्रमों की घोषणा करना सामाजिक न्याय नहीं है; वास्तविक सामाजिक न्याय का माप तब होता है जब हर नागरिक को अपनी गरिमा, संभावनाओं और संभावित उपलब्धियों का समान अवसर मिल सके। समाज तभी प्रगतिशील कहलाएगा जब वह समानता, अवसर, सुरक्षा और सम्मान का आधार प्रत्येक नागरिक की पहचान में निहित कर सके—न कि सिर्फ कुछ वर्गों के लिये बल्कि हर आयु, वर्ग और लिंग-समूह के लिये। यही समावेशी विकास की असली परिभाषा है।

— पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

संस्थापक-निदेशक न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन’ एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन ईमेल: Founder@SrijanSansar..com मोबाइल: +91-9312053330