मुक्तक
चित्र हमारा कभी देखना, किसी पुराने दर्पण में,
माँ की बूढ़ी आँखों में, दादा के टूटे से चश्में में।
कभी देखना बचपन की आँखों में, संग खेलते थे,
फटी पुरानी किसी एल्बम, अपनों के सपनों में।
बचपन के भी चित्र मिलेंगे, होंगे कुछ तरुणाई के,
युवा हुए तो दौड़ रहे थे, चित्र दिखेंगे आशनाई के।
कुछ चित्र ज़िम्मेदारी के होंगे, थोड़े लापरवाही के,
दोस्त सखा मित्रों के संग, कुछ फोटो रूठ मनाई के।
बचपन की बचकानी हरकत, कभी पेड़ पर चढ़ जाना,
कभी बनाना रेत घरोंदे, कभी किसी के तोड़ कर आना।
फाड़ फाड़कर कॉपी अपनी, पानी के जहाज़ बनाते,
चित्र अनूठे बचपन के होते, दर्पण देख देख इतराना।
ऐसे भी कुछ चित्र मिलेंगे, बस कर्तव्य याद रहा,
परिवार खातिर जीना, दिन भर खटना याद रहा।
अपने अधिकारों का तो, हमको कुछ भी भान नहीं,
कॉलर फटा दिख जायेगा, चित्र हमें वह याद रहा।
कुछ चित्र ऐसे भी हैं, जो नहीं किसी को दिखलाए,
टूटे हुए सपनों के चित्र , जिनको पूरा न कर पाये।
चित्र अधूरे अभी बहुत से, जो हमने स्वयं बनाये थे,
ख़ुशियों के भी बहुत, जीवन को प्रफुल्ल कर जाये।
— डॉ. अ. कीर्तिवर्द्धन
