अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से अब तक का हासिल
इतिहास के किसी भी कालखंड में जब भी सभ्यता की आत्म-समीक्षा हुई है, तब-तब यह प्रश्न सामने आया है कि जिस आधी मानवता ने संसार को जन्म दिया, उसे संसार में समान स्थान क्यों नहीं मिला? अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस — जो प्रत्येक वर्ष 8 मार्च को विश्वभर में मनाया जाता है — इसी प्रश्न की परिणति है। यह दिन केवल उत्सव का नहीं, बल्कि एक ऐसे संघर्ष का स्मरण है जिसकी नींव न्यूयॉर्क की उन कपड़ा-मिल की मजदूर महिलाओं ने 8 मार्च 1857 को रखी थी, जब वे अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरी थीं। ठीक पचास वर्ष बाद, 1908 में, हजारों महिलाओं ने पुनः न्यूयॉर्क की सड़कों पर मार्च किया — इस बार माँगें और विशाल थीं: बाल-श्रम की समाप्ति, कारखानों में मानवीय दशाएं और महिलाओं को मताधिकार। 1910 में कोपेनहेगन में हुई अंतरराष्ट्रीय श्रमिक महिला सम्मेलन में जर्मन समाजवादी नेत्री क्लारा ज़ेट्किन ने प्रस्ताव रखा कि प्रत्येक वर्ष एक निश्चित तिथि को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाए। 1911 में पहली बार यह दिवस ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्जरलैंड में आधिकारिक रूप से मनाया गया। संयुक्त राष्ट्र ने 1977 में इसे अधिकृत मान्यता दी। तब से लेकर आज तक का यह सफर — जिसे एक शताब्दी से अधिक समय बीत चुका है — न केवल उपलब्धियों का साक्षी है, अपितु यह भी बताता है कि मंजिल अभी कितनी दूर है।
इस दीर्घकालीन संग्राम में शिक्षा का द्वार सबसे पहले खुला। बीसवीं शताब्दी के आरंभ में जब यह आंदोलन पनप रहा था, तब विश्व के अधिकांश देशों में महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा या तो प्रतिबंधित थी या पुरुषों की दया पर निर्भर। आज स्थिति में आमूल परिवर्तन आया है। भारत में ही राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5, 2019-21) के अनुसार महिला साक्षरता दर 71.5 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है, जो स्वतंत्रता के समय मात्र 8-9 प्रतिशत थी। केरल और मिज़ोरम जैसे राज्यों में यह लगभग शत-प्रतिशत है। उच्च शिक्षा में एक ऐतिहासिक मोड़ 2017-18 में आया जब भारत के महाविद्यालयों में पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाओं ने नामांकन कराया — यह आँकड़ा अपने आप में एक क्रांति का प्रतीक है। विश्व स्तर पर भी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में लैंगिक समानता सूचकांक (GPI) लगभग 1 के करीब आ गया है, जो बालकों और बालिकाओं की समान भागीदारी को दर्शाता है। यह उपलब्धि उन असंख्य अभिभावकों की बदलती सोच का, उन नीतिनिर्माताओं के प्रयासों का और उन लड़कियों के स्वयंसिद्ध साहस का प्रमाण है जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी पाठशाला का रास्ता नहीं छोड़ा।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व के क्षेत्र में भी परिदृश्य बदला है, यद्यपि गति अभी भी आवश्यकता से बहुत धीमी है। एक सदी पहले जब इस आंदोलन की शुरुआत हुई, तब अधिकांश देशों में महिलाओं को मताधिकार तक प्राप्त नहीं था। न्यूजीलैंड 1893 में पहला देश बना जिसने महिलाओं को मतदान का अधिकार दिया। भारत ने 1950 में अपने संविधान के साथ ही यह अधिकार दिया — जो एक प्रगतिशील कदम था। आज विश्व के लगभग सभी देशों में महिलाएं मतदाता हैं, संसद में हैं, सरकारें चला रही हैं। न्यूज़ीलैंड की जेसिंडा आर्डर्न, जर्मनी की एंगेला मर्केल, बांग्लादेश में नेतृत्व करने वाली नेत्रियाँ — ये नाम उस संभावना के जीवंत प्रमाण हैं जो एक शताब्दी पहले कल्पनातीत थी। भारत में भी इंदिरा गांधी से लेकर द्रौपदी मुर्मु तक की यात्रा राजनीतिक सशक्तिकरण की एक महत्वपूर्ण गाथा है। पंचायती राज व्यवस्था में बिहार, उत्तराखंड, राजस्थान जैसे राज्यों में 50 प्रतिशत आरक्षण के कारण लाखों महिलाएं स्थानीय शासन में निर्णायक भूमिका निभा रही हैं। हालाँकि, संसद में यह यात्रा अभी भी अधूरी है — 2024 में लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 13.6 प्रतिशत है, जो वैश्विक औसत 26.5 प्रतिशत से बहुत कम है। 2023 में संसद ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान करता है, किंतु इसके कार्यान्वयन के लिए परिसीमन की शर्त जोड़ दी गई जिससे यह लाभ अभी वर्षों दूर है।
आर्थिक सशक्तिकरण के मोर्चे पर जो परिवर्तन हुए हैं, वे उत्साहजनक हैं — किंतु जो नहीं हुए, वे और भी अधिक महत्वपूर्ण कहानी कहते हैं। भारत में महिला श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) 2017-18 में 23.3 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 41.7 प्रतिशत हो गई है — लगभग दोगुनी वृद्धि। यह एक बड़ी छलाँग है, किंतु वैश्विक औसत 47 प्रतिशत से अभी भी पीछे है। MGNREGS जैसी योजनाओं में महिलाओं ने 57.8 प्रतिशत व्यक्ति-दिवस का योगदान दिया है, जो ग्रामीण महिला श्रम की अदृश्य शक्ति को दृश्यमान बनाता है। वैश्विक स्तर पर, फॉर्च्यून 500 कंपनियों में सीईओ पद पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व 2014 के 4.6 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 10.4 प्रतिशत हो गया है। यह प्रगति है, परंतु यह भी याद रहे कि वर्तमान गति से पूर्ण लैंगिक समानता प्राप्त करने में 152 वर्ष लगेंगे। अर्थात् जो संघर्ष 1857 में आरंभ हुआ, वह 2177 तक भी पूरा न होगा — यदि हमने अपनी चाल नहीं बदली। विश्व आर्थिक मंच (WEF) की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2023 का यह निष्कर्ष मानवता के लिए एक गहरी चुनौती है।
महिला स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति और गहरी चिंताएं साथ-साथ चलती हैं। मातृ मृत्यु दर में भारत ने उल्लेखनीय कमी की है — 2014-16 में प्रति एक लाख जीवित जन्म पर 130 से घटकर 2018-20 में 97 तक। जननी सुरक्षा योजना, जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम और प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना ने गर्भवती महिलाओं की स्वास्थ्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वैश्विक स्तर पर विश्व आर्थिक मंच की रिपोर्ट के अनुसार, महिला स्वास्थ्य अंतराल के कारण प्रतिवर्ष 7.5 करोड़ वर्षों का जीवन खराब स्वास्थ्य या असमय मृत्यु के कारण नष्ट होता है, और इस अंतराल को पाटने से 2040 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक लाख करोड़ डॉलर की वृद्धि हो सकती है। यह आँकड़ा केवल मानवीय नहीं, आर्थिक और नैतिक — दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। महिला स्वास्थ्य में निवेश न केवल उचित है, बल्कि यह वैश्विक समृद्धि की अनिवार्य शर्त भी है।
कानूनी और संवैधानिक क्षेत्र में हुई प्रगति इस यात्रा का एक सुनहरा अध्याय है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, और 21 ने महिलाओं को समानता, भेदभाव-विरोध, समान अवसर और जीवन के अधिकार की संवैधानिक गारंटी दी। 1961 का दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1983 की घरेलू हिंसा से संबंधित धारा 498-क, 2005 का घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2013 का यौन उत्पीड़न से कार्यस्थल पर महिलाओं का संरक्षण अधिनियम (POSH Act), और 2012 के निर्भया कांड के बाद बलात्कार कानूनों में कठोर संशोधन — ये सब उस विधायी संघर्ष की परिणतियाँ हैं जो महिला आंदोलन ने दशकों तक लड़ा। 2024 में फ्रांस ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर गर्भपात के अधिकार को अपने संविधान में शामिल किया — ऐसा करने वाला वह पहला देश बना। ये कदम इस बात के प्रमाण हैं कि समाज और राज्य की सोच धीरे-धीरे बदल रही है, यद्यपि पर्याप्त नहीं।
MeToo आंदोलन, जो 2017 में हैरी वाइनस्टीन प्रकरण के बाद तूफान की तरह उठा, इस संघर्ष का एक नया और शक्तिशाली अध्याय है। सोशल मीडिया के माध्यम से हजारों महिलाओं ने एक साथ आवाज उठाई और वह सत्य सार्वजनिक किया जिसे वर्षों से दबाया जाता रहा था। भारत में भी इस आंदोलन ने बॉलीवुड, मीडिया, शिक्षा और राजनीति — हर क्षेत्र में छुपे उत्पीड़न को उजागर किया। यह आंदोलन यह भी सिखाता है कि स्त्री-सशक्तिकरण केवल नीतियों और कानूनों से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और एकजुटता से भी आता है।
किंतु इस यात्रा की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जितनी उपलब्धियाँ गिनाई जाती हैं, उनके साथ-साथ असमानता के वे पहाड़ भी हैं जो अभी नहीं हटे। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार, विश्व की कुल कार्यशील आयु महिलाओं में से आधे से कम ही वैश्विक श्रम बाजार में सक्रिय हैं, जबकि पुरुषों में यह अनुपात 72 प्रतिशत है। वैश्विक स्तर पर SDG-5 के तहत लैंगिक समानता से संबंधित 17 संकेतकों में से एक भी ‘लक्ष्य प्राप्त या लगभग प्राप्त’ की श्रेणी में नहीं है। यह वैश्विक समुदाय के उस वादे की विफलता है जो 2015 में 2030 तक लैंगिक समानता प्राप्त करने के लिए किया गया था। 2030 तक वैश्विक स्तर पर 34 करोड़ से अधिक महिलाएं और बालिकाएं अत्यंत गरीबी में — प्रतिदिन 2.15 डॉलर से कम पर — जीवन यापन करती रहेंगी, यदि वर्तमान गति से प्रगति होती रही। यह केवल आर्थिक नहीं, मानवीय संकट है।
भारत के संदर्भ में यह असमानता और भी स्पष्ट रूप से दिखती है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में महिलाओं का योगदान मात्र 17 प्रतिशत है, जबकि वे जनसंख्या का आधा हिस्सा हैं। यदि महिला श्रम बल भागीदारी दर को वर्तमान से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया जाए, तो विश्व बैंक के आकलन के अनुसार भारत 8 प्रतिशत जीडीपी विकास दर के निकट पहुँच सकता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की पूर्व प्रमुख क्रिस्टीन लगार्द का कहना रहा है कि यदि भारत में पुरुषों के समान महिलाओं की श्रम भागीदारी हो, तो जीडीपी 27 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। यह केवल महिला न्याय का मुद्दा नहीं, राष्ट्रीय विकास की अनिवार्यता है। फिर भी STEM कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी मात्र 29 प्रतिशत है, और उच्च पदों पर जाने से पहले ही ‘ग्लास सीलिंग’ उनकी उड़ान को रोक देती है।
लैंगिक हिंसा — जो इस पूरी यात्रा की सबसे बड़ी बाधा रही है — के आँकड़े अभी भी विचलित करने वाले हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, भारत में महिलाओं के विरुद्ध अपराध के मामले 2012 के 2.44 लाख से बढ़कर 2022 में 4.45 लाख से अधिक हो गए — जो भी एक दोधारी तथ्य है, क्योंकि इसमें जागरूकता बढ़ने से रिपोर्टिंग में वृद्धि भी शामिल है। विश्व बैंक की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, कार्यशील आयु की लगभग 2.4 अरब महिलाएं ऐसी अर्थव्यवस्थाओं में रह रही हैं जो उन्हें पुरुषों के समान अधिकार नहीं देतीं। यह आँकड़ा — 2.4 अरब — एक ऐसी संख्या है जो किसी भी संवेदनशील मन को झकझोर दे। यह कहता है कि अधिकारों की यह लड़ाई अभी भी अपने सबसे बुनियादी स्तर पर चल रही है।
डिजिटल क्रांति ने महिला सशक्तिकरण की दिशा में नए द्वार खोले हैं, साथ ही नई चुनौतियाँ भी। ई-कॉमर्स और डिजिटल बैंकिंग ने ग्रामीण महिला उद्यमियों को बाजार तक पहुँच दी है। प्रधानमंत्री जन धन योजना के अंतर्गत करोड़ों महिलाओं के बैंक खाते खुले जिससे वित्तीय समावेशन की एक नई लहर आई। स्वयं सहायता समूहों (SHG) का जाल — जिसमें भारत में लगभग 1.2 करोड़ से अधिक SHG सक्रिय हैं — महिलाओं की सामूहिक आर्थिक शक्ति का एक अद्वितीय उदाहरण बना है। IWD 2023 का थीम ‘DigitALL’ भी यही कहता था कि डिजिटल भविष्य को समावेशी बनाना होगा। दूसरी ओर, साइबर उत्पीड़न, ऑनलाइन ट्रोलिंग और डीपफेक तकनीक का दुरुपयोग महिलाओं को डिजिटल सार्वजनिक जीवन से पीछे धकेलने का नया औजार बन रहा है।
जलवायु परिवर्तन और महिला सशक्तिकरण के बीच का संबंध — जिसे अक्सर अनदेखा किया जाता है — भी इस चर्चा का एक अभिन्न अंग है। जलवायु संकट का सबसे अधिक बोझ महिलाओं पर पड़ता है, विशेषकर विकासशील देशों में, जहाँ ग्रामीण महिलाएं जल, ईंधन और भोजन जुटाने के लिए अतिरिक्त श्रम करती हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 2030 तक वैश्विक स्तर पर एक-चौथाई महिलाएं और बालिकाएं मध्यम या गंभीर खाद्य असुरक्षा का शिकार होंगी। इसलिए महिला सशक्तिकरण और पर्यावरणीय न्याय दो अलग-अलग एजेंडा नहीं, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के इस विकास-क्रम पर दृष्टि डालें तो विषयों की यात्रा स्वयं में एक कहानी कहती है। 2020 में ‘Each for Equal’, 2021 में ‘Choose to Challenge’, 2022 में ‘Break the Bias’, 2023 में ‘DigitALL’, 2024 में ‘Invest in Women: Accelerate Progress’ और 2025 में ‘For All Women and Girls: Rights, Equality, Empowerment’ — ये थीम न केवल वार्षिक उद्घोष हैं, बल्कि इस संघर्ष की चेतना का क्रमिक विकास भी हैं। ये थीम यह भी बताते हैं कि हर वर्ष जो मुद्दे उठाए जाते हैं, वे अभी भी अनसुलझे हैं — अन्यथा उनको बार-बार क्यों दुहराया जाता?
यह संपादकीय यहाँ आकर एक मौलिक निष्कर्ष की ओर जाता है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की 115 वर्ष से अधिक की यात्रा में जो हासिल हुआ है, वह असाधारण है — मताधिकार, शिक्षा, कानूनी सुरक्षाएं, राजनीतिक भागीदारी, आर्थिक स्वायत्तता और वैश्विक चेतना में महिला अधिकारों की स्थायी स्थापना। चार वैश्विक संयुक्त राष्ट्र महिला सम्मेलनों ने इस आंदोलन को वैश्विक आयाम दिया और इसे एक राजनीतिक-आर्थिक एजेंडे के रूप में स्थापित किया। किंतु जो नहीं हासिल हुआ, वह इससे भी बड़ा है। विश्व आर्थिक मंच की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2023 के अनुसार, वर्तमान गति से पूर्ण लैंगिक समानता प्राप्त करने में 131 वर्ष और लगेंगे। अर्थात् आज जो बालिका जन्म ले रही है, उसकी पोती या परपोती के युग में भी यह संघर्ष समाप्त नहीं होगा — यदि हमने अपनी प्रतिबद्धता को केवल उत्सवों तक सीमित रखा।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस अब एक अनुष्ठान नहीं रहना चाहिए। यह एक आह्वान है — राज्य के लिए कि वह कानूनों को कागज से उतारकर जमीन पर उतारे; समाज के लिए कि वह सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों को चुनौती दे; और प्रत्येक व्यक्ति के लिए कि वह अपने दैनिक व्यवहार में समानता को जिए। जब तक एक भी महिला अपने जन्म को अभिशाप मानने वाले परिवेश में जी रही है, जब तक एक भी बालिका स्कूल के बाहर है, जब तक एक भी महिला कार्यस्थल पर उत्पीड़न सह रही है — तब तक अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का उत्सव अधूरा है। यह दिन उत्सव से अधिक, संकल्प का दिन है — इस संकल्प का कि जो हासिल हुआ है, उसे और विस्तार दिया जाएगा; और जो अभी शेष है, वह पूरा किया जाएगा — इसी पीढ़ी में, इसी काल में।
— पूनम चतुर्वेदी शुक्ला
