कृत्रिम मेधा सिद्ध हो सकती है देश के विकास का इंजन
इतिहास गवाह है कि जब भी किसी देश ने तकनीकी परिवर्तन की लहर को समय पर पहचाना और उसे अपनाया, वह राष्ट्र युगों तक आगे रहा। 18वीं सदी में भाप के इंजन ने ब्रिटेन को औद्योगिक महाशक्ति बनाया। 20वीं सदी में सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति ने अमेरिका को वैश्विक नेतृत्व दिलाया। आज 21वीं सदी के तीसरे दशक में, कृत्रिम मेधा — अर्थात् Artificial Intelligence (AI) — वह शक्ति बनकर उभरी है जो संपूर्ण विश्व की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संरचना को पुनर्परिभाषित कर रही है। भारत के लिए यह अवसर केवल तकनीकी उन्नति का नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक छलांग का है। एक ऐसे देश में जहाँ 140 करोड़ से अधिक की जनसंख्या है, जहाँ कृषि से लेकर स्वास्थ्य तक, शिक्षा से लेकर न्याय तक हर क्षेत्र में व्यापक सुधार की आवश्यकता है — वहाँ कृत्रिम मेधा सिर्फ एक उपकरण नहीं, बल्कि विकास का इंजन बन सकती है।
AI का वैश्विक परिदृश्य : आँकड़े जो बोलते हैं : अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की एक रिपोर्ट के अनुसार, AI वैश्विक GDP में 7 प्रतिशत तक की वृद्धि करने की क्षमता रखती है, जो लगभग 7 ट्रिलियन डॉलर के बराबर है। McKinsey Global Institute का अनुमान है कि 2030 तक AI-आधारित स्वचालन से वैश्विक अर्थव्यवस्था में 13 ट्रिलियन डॉलर का अतिरिक्त मूल्य सृजन हो सकता है। Goldman Sachs की 2023 की एक रिपोर्ट में यह रेखांकित किया गया कि Generative AI अकेले ही वैश्विक स्तर पर उत्पादकता में 1.5 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि कर सकती है। विश्व आर्थिक मंच (WEF) के अनुसार, 2025 तक AI से संबंधित क्षेत्रों में 9.7 करोड़ नए रोजगार के अवसर उत्पन्न होने की संभावना थी। इन आँकड़ों के प्रकाश में भारत की स्थिति को देखें तो NASSCOM और Deloitte के एक संयुक्त अध्ययन के अनुसार, AI भारतीय अर्थव्यवस्था में 2025 तक 450-500 बिलियन डॉलर का योगदान देने में सक्षम थी। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अनुसार भारत का AI बाज़ार 2025 तक 6 बिलियन डॉलर से अधिक हो सकता है।
कृषि क्षेत्र में AI : ‘अन्नदाता’ को ‘डेटादाता’ बनाने की संभावना : भारत की 60 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। यह क्षेत्र अनेक संरचनात्मक चुनौतियों से ग्रस्त है — अनियमित वर्षा, मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट, फसल रोग और बाज़ार तक पहुँच का अभाव। AI इन सभी समस्याओं का समाधान बनकर उभर सकती है। Remote sensing और satellite imagery के साथ AI-मॉडल का संयोजन करके फसल पैटर्न का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। Microsoft और International Crops Research Institute for the Semi-Arid Tropics (ICRISAT) ने मिलकर आंध्र प्रदेश में एक AI-आधारित प्रणाली विकसित की जिसने मूँगफली उत्पादन में 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। Precision Agriculture में AI सेंसर, ड्रोन और मशीन लर्निंग के माध्यम से किसानों को बता सकती है कि कब, कहाँ और कितनी सिंचाई, खाद और कीटनाशक की आवश्यकता है। इससे न केवल उत्पादन लागत घटती है, बल्कि पर्यावरणीय क्षति भी कम होती है। भारत सरकार की ‘किसान सारथी’ पहल और ‘डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन’ इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं।
स्वास्थ्य सेवा में AI : जन-जन तक चिकित्सा की पहुँच : भारत में प्रति 1000 लोगों पर केवल 0.7 चिकित्सक हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुशंसित अनुपात 1 :1000 से काफी कम है। ग्रामीण भारत में स्थिति और भी विकट है। ऐसे में AI एक बड़ी भूमिका निभा सकती है। AI-आधारित diagnostic tools, जैसे कि Google Health का DeepMind, डायबिटिक रेटिनोपैथी की पहचान में 90 प्रतिशत से अधिक की सटीकता दिखा चुका है। भारत में Niramai Health Analytix ने एक AI-आधारित स्क्रीनिंग टूल विकसित किया है जो स्तन कैंसर की पहचान मैमोग्राफी से भी अधिक सटीकता से करता है। ऐसे उपकरण, जब Telemedicine और Mobile Health Platforms के साथ जुड़ते हैं, तो दूरदराज के गाँवों तक विशेषज्ञ चिकित्सा पहुँचाने का माध्यम बन सकते हैं। COVID-19 महामारी के दौरान AI ने vaccine development में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। Oxford-AstraZeneca वैक्सीन के विकास में AI-आधारित protein folding और molecular simulation ने समय को काफी घटाया। AIIMS दिल्ली और IIT मिलकर AI-आधारित radiology tools पर काम कर रहे हैं जो TB और lung cancer की शीघ्र पहचान में सहायक हैं।
शिक्षा में AI : सबके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का सपना : भारत में शिक्षा की गुणवत्ता और उपलब्धता में भारी असमानता है। ASER (Annual Status of Education Report) की रिपोर्टें बताती आई हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे पाँचवीं कक्षा तक पहुँचकर भी दूसरी कक्षा का पाठ नहीं पढ़ पाते। AI-आधारित Adaptive Learning Systems प्रत्येक विद्यार्थी की सीखने की गति, शैली और कमज़ोरियों के अनुरूप पाठ्यक्रम तैयार कर सकती हैं। Khan Academy का ‘Khanmigo’, Duolingo का AI-ट्यूटर और भारत के BYJU’S जैसे platforms इस दिशा में पहले से काम कर रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी AI को शिक्षा में एकीकृत करने की बात करती है। प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (Natural Language Processing – NLP) के क्षेत्र में हुई प्रगति ने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में AI-उपकरणों को संभव बनाया है। Google का ‘Bolo’ ऐप, जो हिंदी और अंग्रेज़ी में बच्चों को पढ़ना सिखाता है, इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। ऐसी तकनीक भाषाई विविधता वाले भारत में शिक्षा की पहुँच को क्रांतिकारी रूप से बदल सकती है।
शासन और नीति-निर्माण में AI : पारदर्शिता और दक्षता : भारतीय नौकरशाही की एक बड़ी समस्या यह है कि नीतियाँ बनती हैं किंतु उनका क्रियान्वयन अपेक्षित गति और गुणवत्ता के साथ नहीं होता। AI इस खाई को पाटने में सहायक हो सकती है। NITI Aayog ने अपनी ‘National Strategy for Artificial Intelligence’ (2018) में पाँच प्रमुख क्षेत्रों — कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, स्मार्ट सिटी और स्मार्ट मोबिलिटी — में AI के अनुप्रयोग की रूपरेखा प्रस्तुत की थी। यह दस्तावेज़ भारत को “AI for All” की अवधारणा पर केंद्रित करता है — न केवल आर्थिक लाभ के लिए, बल्कि सामाजिक समावेश के लिए भी। Tax administration में AI के प्रयोग से कर चोरी की पहचान, Predictive Analytics के माध्यम से Public Distribution System (PDS) में लीकेज की रोकथाम और Smart Traffic Management जैसे क्षेत्रों में AI पहले से ही सरकारी स्तर पर परखी जा रही है। Andhra Pradesh सरकार का ‘SMART’ (State Machine Assisted Real-time Tracking) प्रोजेक्ट इस दिशा में एक उल्लेखनीय प्रयास रहा है।
उद्योग और विनिर्माण : ‘मेक इन इंडिया’ को ‘AI इन इंडिया’ का बल : भारत की Manufacturing GDP में हिस्सेदारी लगातार सीमित रही है। AI-आधारित Industry 4.0 — जिसमें IoT, Robotics और Machine Learning का संयोजन होता है — भारत के विनिर्माण क्षेत्र को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बना सकता है। Predictive Maintenance, Quality Control में Computer Vision का उपयोग और Supply Chain Optimization जैसे क्षेत्रों में AI पहले से ही Tata Steel, Mahindra और Wipro जैसी भारतीय कंपनियों में लागू हो रही है। DPIIT (Department for Promotion of Industry and Internal Trade) के अनुसार, AI-enabled manufacturing से उत्पादन लागत में 15-20 प्रतिशत तक की कमी लाई जा सकती है। Start-up Ecosystem की बात करें तो भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा Start-up Ecosystem है। 2023-24 में भारत में 100 से अधिक AI-आधारित स्टार्टअप्स को महत्त्वपूर्ण निवेश मिला। iNDEXTb (Gujarat), KashmirBox और AgriGenomeics जैसी कंपनियाँ सिद्ध कर रही हैं कि भारत की समस्याओं का समाधान ‘भारत में बना AI’ दे सकता है।
चुनौतियाँ जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता : संपादकीय की संतुलित दृष्टि की माँग है कि AI के वादे के साथ-साथ उसकी चुनौतियों पर भी निष्पक्ष विचार किया जाए। डिजिटल विभाजन : भारत में अभी भी लगभग 50 करोड़ से अधिक लोग इंटरनेट की पहुँच से वंचित हैं (TRAI रिपोर्ट के अनुसार)। जब तक बुनियादी डिजिटल ढाँचा नहीं बनेगा, AI का लाभ समाज के निचले तबके तक नहीं पहुँच सकता। रोज़गार विस्थापन का भय : WEF के अनुसार, AI से 2025 तक 8.5 करोड़ नौकरियाँ विस्थापित हो सकती हैं। भारत जैसे श्रम-प्रधान देश में यह एक गंभीर चिंता है। Call Centers, Data Entry और Routine Manufacturing — तीनों ही क्षेत्रों में बड़ी संख्या में भारतीय कार्यरत हैं। इसलिए ‘Reskilling’ और ‘Upskilling’ की नीतियाँ AI नीति का अभिन्न हिस्सा होनी चाहिए।
डेटा गोपनीयता और सुरक्षा : AI डेटा पर जीवित रहती है और भारत में डेटा संरक्षण का ढाँचा अभी परिपक्व नहीं हुआ है। Digital Personal Data Protection Act 2023 एक सही दिशा में उठाया गया कदम है, किंतु इसके क्रियान्वयन को और सशक्त करने की आवश्यकता है।
एल्गोरिदमिक पूर्वाग्रह : यदि AI प्रणालियों को प्रशिक्षित करने के लिए उपयोग किया जाने वाला डेटा पक्षपाती है, तो AI के निर्णय भी पक्षपाती होंगे। जाति, लिंग और भूगोल-आधारित भेदभाव को AI के माध्यम से और गहरा न किया जाए — यह सुनिश्चित करना सरकार और उद्योग दोनों की ज़िम्मेदारी है।
भारत की ताकत : AI में वैश्विक नेतृत्व की संभावना : आलोचनाओं के बावजूद, भारत की कुछ विशिष्ट शक्तियाँ हैं जो उसे AI के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व दे सकती हैं। सबसे पहले — मानव पूँजी : भारत हर साल 15 लाख से अधिक इंजीनियर पैदा करता है। IITs, NITs और IISc जैसे संस्थानों से निकले प्रतिभाशाली युवा Google, Microsoft, Amazon और OpenAI जैसी कंपनियों में नेतृत्व पदों पर हैं। सुंदर पिचाई (Google), सत्या नडेला (Microsoft) और अरविंद कृष्णा (IBM) — यह सब भारत की बौद्धिक क्षमता के प्रमाण हैं। दूसरा — डेटा की विशालता : 140 करोड़ की जनसंख्या का डेटा, Aadhaar, UPI और DigiLocker जैसी प्रणालियों से जुड़ा हुआ, भारत को दुनिया का सबसे बड़ा और विविध डेटा भंडार बनाता है। AI जितने अधिक और विविध डेटा पर प्रशिक्षित होती है, उतनी ही सटीक होती है। तीसरा — लागत प्रतिस्पर्धात्मकता : भारत में AI विकास की लागत पश्चिमी देशों की तुलना में काफी कम है। यह ‘AI as a Service’ के क्षेत्र में भारत को वैश्विक hub बना सकता है।
सरकारी पहलें और नीतिगत दिशा
भारत सरकार ने AI को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में मान्यता दी है। ‘IndiaAI Mission’ के अंतर्गत 2024 में 10,372 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया। इस मिशन के तहत Computing Infrastructure, Foundation Models, Application Development, Data Platforms और Skilling — पाँच प्रमुख स्तंभों पर काम हो रहा है। ‘AI for All’ की नीति के तहत सरकार छोटे और मध्यम उद्यमों (MSMEs) को AI उपकरण सुलभ कराने की दिशा में काम कर रही है। IIT Bombay, IIT Delhi और IISc में AI Research Centers की स्थापना और National AI Portal (ai.gov.in) की शुरुआत — ये सब संकेत देते हैं कि नीतिगत इच्छाशक्ति विद्यमान है।
संपादकीय निष्कर्ष : अवसर की खिड़की अभी खुली है : यह संपादकीय इस निष्कर्ष पर आता है कि कृत्रिम मेधा भारत के विकास का इंजन बनने की पूरी क्षमता रखती है — बशर्ते कि हम इसे सही दिशा, सही नीतियों और सही नैतिक ढाँचे के साथ अपनाएँ। यह केवल तकनीकी प्रश्न नहीं है — यह एक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रश्न है। AI को केवल कॉर्पोरेट मुनाफे का साधन नहीं बनने देना चाहिए; इसे जन-सशक्तीकरण का माध्यम बनाना होगा। किसान, मरीज़, विद्यार्थी, छोटे व्यापारी — यदि AI उनकी ज़िंदगी बेहतर नहीं बनाती, तो इस क्रांति का कोई अर्थ नहीं। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था — “Thinking is the capital, enterprise is the way, hard work is the solution.” भारत के पास सोच की पूँजी है, डिजिटल उद्यम का मार्ग है और अब AI के रूप में एक अद्वितीय उपकरण भी है। आवश्यकता है — दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, समावेशी नीतियों, नैतिक दिशानिर्देशों और समाज की सामूहिक भागीदारी की। यदि हम इस अवसर को चूक गए, तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। और यदि हमने इसे सही से भुनाया, तो 21वीं सदी सही मायनों में भारत की सदी होगी।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
