सामाजिक

समाज में वैमनस्य का जहर घोलती भारतीय राजनीति

भारत का आध्यात्मिक धरातल, दर्शन, चिंतन समग्र समाज को साथ लेकर चलने का रहा है। भारत में कभी भी जातीय वैमनस्य व घृणा नहीं रही। हां भारत में मध्यकाल में अर्थात् मुगलों के आक्रमण के समय कुछ मूल्यों का अवमर्दन हुआ जो कभी स्थाई नहीं रहा। समाज को तोड़ने वाली जरूर कुछ ताकतें समय – समय पर ईर्ष्या और घृणा, समाज में पैदा करने का कार्य किए हैं। भारत का आध्यात्मिक चिंतन कहता है कि हम सभी एक पूर्वज की संतान हैं सभी आपस में सहोदर हैं। हमारे आदि पूर्वज मनु हैं जिनसे यह मनुष्य शब्द बना है। इसलिए हम कहते हैं कि हम मनु की संतान हैं तत्कालीन समाज व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए चार विभागों की रचना हुई जिनके क्रमशः नाम दिए गए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जिन्हें वर्ण कहा गया और इन सबके पूर्वज अर्थात जनक एक ही हैं। इन सभी को समाज रचना धर्माधारित चले इस निमित्त कार्य दायित्व भी बताए गए हैं। समाज के सुदृढ़ व्यवस्था के लिए सारे कार्य एक दूसरे के पूरक हैं। इनमें संघर्ष को कोई स्थान नहीं है। वाह्य रूप से दिखाई देने वाला विभेद प्राकृतिक है। जिस प्रकार से प्रकृति में विभिन्न प्रकार के भेद दिखाई पड़ते हैं उसी प्रकार से समाज में भी भेद दिखाई पड़ते हैं किन्तु यह सारे भेद सुन्दर व्यवस्था के पोषक हैं। भेदाभेद प्रकृति का नियम है। हम कहते भी हैं अनेकता में एकता भारत की विशेषता। इस प्राकृतिक भेद में सामंजस्य है, स्नेह है, बंधुत्व भाव है, समाज का नैतिक संतुलन भी है। इसमें किसी प्रकार का वैमनस्य नहीं है। भेदाभेद शाश्वत है इनमें परिवर्तन करना प्रकृति को चुनौती देना है। आज जिस प्रकार का भेद का जहर समाज में घोला जा रहा है उसके परिणाम अत्यंत विनाशकारी सिद्ध होने वाले हैं। आज स्त्री और पुरुष की समानता यहां तक होने लगी है कि लिंग परिवर्तन ही लोग करा रहे हैं यह समानता नहीं विकृति है। पुरुष महिला नहीं बन सकता , महिला पुरुष नहीं बन सकती। यह भेद रहना ही है जो स्वाभाविक है। इसी प्रकार परिवार में बाह्य रूप से तमाम भेद दिखते है। कोई मां है, कोई बहन है, कोई पिता है, बाबा है, दादी, है छोटा है, बड़ा है। यह सारे भेद मिलकर ही परिवार बनता है अब यह भेद हटा दिया जाए तो संघर्ष होगा। मन पसन्द किसी को पद, दायित्व नहीं मिल सकता यह परिवार में सामंजस्य के प्रतिकूल है। आज भारत में इसी तथाकथित समानता को लेकर राजनैतिक दल अगड़ा, पिछड़ा, अनुसूचित, दलित का विभेद पैदा कर संघर्ष की खाई खोदी जा रही है। इसमें भारत के आज सभी राजनैतिक दल शामिल हैं। यह राजनैतिक दल स्थान – स्थान समाज को तोड़ने, आपस में लड़ाने, मनमुटाव पैदा करने ऊंच- नीच में बांटने जातीय घृणा जैसे घिनौने काम कर रहे हैं। यह राजनैतिक लोग कभी खुलकर जातीय वैमनस्य पैदा करते हैं तो कभी अपने कुत्सित प्रयास से पर्दे के पीछे से घृणित लोगों के द्वारा कुत्सित विमर्श का कार्य करा रहे हैं। यह लोग कभी आंबेडकर के नाम का उपयोग करेंगे, कभी परशुराम का उपयोग करेंगे, कभी शिवाजी महाराज का उपयोग कर समाज को लड़ाते हैं और नीचता तो यहां तक करते हैं कि कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी लोगों को खरीद कर मनमानी पुस्तक लिखा कर उसका सन्दर्भ देंगे कि यह देखिए भारत में हमारे साथ कितना अन्याय हुआ है। भारत का समाज अत्यंत भावुक समाज है , आध्यात्मिक समाज है इसे झांसा देना अत्यंत पाप है किंतु यह राजनेता सब कर रहे हैं अतः भारत में वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य ऐसा बन रहा है कि समाज को आपस में लड़ाया जाए और पर्दे के पीछे से व्यक्तिगत और निजी कुटुम्ब का पोषण किया जाए।

— बाल भास्कर मिश्र

*बाल भास्कर मिश्र

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