धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

फीके पड़ते रंग, टूटते रिश्ते

होली भारतीय समाज का ऐसा पर्व रहा है, जो केवल रंगों तक सीमित नहीं था। यह मनुष्यों के बीच की दूरी मिटाने, वर्षों की कड़वाहट धो डालने और रिश्तों में नई ताजगी भरने का अवसर हुआ करता था। फाल्गुन का महीना आते ही वातावरण में एक अलग-सी उमंग घुल जाती थी। हवा में गुलाल की गंध, गलियों में बच्चों की किलकारियाँ और घर-घर से उठती लोकगीतों की स्वर-लहरियाँ जीवन को उत्सव में बदल देती थीं।

पर आज की होली, बीते समय की होली से काफ़ी अलग दिखाई देती है। समय के साथ समाज बदला है, तकनीक बढ़ी है, सुविधाएँ आई हैं—लेकिन इन्हीं बदलावों के बीच कहीं न कहीं रिश्तों की ऊष्मा ठंडी पड़ गई है। रंग अब भी हैं, पर वे दिलों तक नहीं पहुँच पाते। एक समय था जब होली का मतलब केवल एक दिन का उत्सव नहीं होता था। वसंत पंचमी से ही इसकी तैयारियाँ शुरू हो जाती थीं। मंदिरों में फाग गूँजने लगता था, चौपालों पर ढप-चंग की थाप सुनाई देती थी और गाँव-मोहल्लों में रसिया गाने वालों की टोलियाँ निकल पड़ती थीं। यह सामूहिकता ही होली की आत्मा थी।

बच्चे मोहल्लों में समूह बनाकर होली का दान इकट्ठा करते थे। किसी ने मना भी कर दिया, तो बुरा नहीं मानते थे—हँसते-हँसाते आगे बढ़ जाते थे। रंग लगाना अपराध नहीं, अपनापन जताने का तरीका था। कोई डाँट भी दे, तो उसे होली की मस्ती समझकर भुला दिया जाता था। आज वही बच्चे मोबाइल की स्क्रीन में सिमट गए हैं, और मोहल्ले संवादहीन हो चले हैं।
होली का सबसे सुंदर पक्ष यह था कि उस दिन सामाजिक भेद-भाव धुंधले पड़ जाते थे। अमीर-गरीब, छोटा-बड़ा, अपना-पराया—सब एक ही रंग में रंगे नज़र आते थे। दुश्मन भी गले मिल लेते थे। “बुरा न मानो, होली है” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि सामाजिक सहमति थी कि आज दिल खोलकर जिया जाएगा।

आज वही वाक्य मज़ाक बनकर रह गया है। लोग रंगों से ज़्यादा सीमाएँ बचाने में व्यस्त हैं। कहीं कोई अनहोनी न हो जाए, कहीं कोई विवाद न खड़ा हो जाए—इस डर ने होली की सहजता छीन ली है। पहले घर-घर पकवान बनते थे। गुजिया, दही-बड़े, मालपुए और ठंडाई की खुशबू पूरे मोहल्ले में फैल जाती थी। पड़ोसियों की बहू-बेटियाँ भी अपने ही घर की सदस्य मानी जाती थीं। मेहमानों का स्वागत खुले दिल से होता था। आज उत्सव घर की चार दीवारों तक सिमट गए हैं। एक औपचारिक “होली मुबारक” या “हैप्पी होली” का संदेश रिश्तों की गर्मजोशी का स्थान ले चुका है।

समाज में बढ़ती असुरक्षा और अविश्वास ने पारिवारिक व्यवहार को भी बदल दिया है। पहले लड़कियाँ होली के दिनों में सहेलियों और रिश्तेदारों के यहाँ देर तक रुक जाती थीं। हँसी-मज़ाक और गीत-संगीत के बीच समय कैसे बीत जाता था, पता ही नहीं चलता था। आज वही बातें चिंता का कारण बन जाती हैं। रिश्तों पर संदेह की परतें चढ़ गई हैं।
परंपराएँ भी धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं। कभी घरों में टेसू और पलाश के फूलों से प्राकृतिक रंग बनाए जाते थे। महिलाएँ लोकगीत गाते हुए रंग घोलती थीं और बच्चे उत्सुकता से इंतज़ार करते थे। छोटी-छोटी लड़कियाँ गाय के गोबर से वलुडिया बनाती थीं, उन पर मालाएँ सजाती थीं। ये केवल रस्में नहीं थीं, बल्कि सामूहिक श्रम और रचनात्मकता के प्रतीक थे।
आज बाज़ार से खरीदे गए रासायनिक रंगों ने उन परंपराओं की जगह ले ली है। सुविधा बढ़ी है, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव घटा है। लोकगीत अब कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित रह गए हैं। फाग और रसिया की धुनें, जो कभी फाल्गुन भर गूँजती थीं, अब दुर्लभ हो गई हैं।

होली के बाद की वह शांति भी कभी सुकून देती थी। पानी की बौछारों और हँसी की आवाज़ों के बाद जो ठहराव आता था, वह थकान नहीं, तृप्ति लेकर आता था। आज उत्सव कुछ घंटों में समाप्त हो जाता है और उसके साथ ही समाज फिर अपनी-अपनी बंद दुनिया में लौट जाता है। हाल के वर्षों में सामाजिक तनाव और विभाजन ने होली जैसे उत्सवों को और भी सीमित कर दिया है। कई परिवार इस दिन घर से बाहर निकलने से बचते हैं। जबकि त्योहारों का मूल उद्देश्य ही लोगों को जोड़ना, डर और नकारात्मकता से बाहर निकालना होता है।
होली केवल रंगों का पर्व नहीं है; यह क्षमा का पर्व है, मेल-मिलाप का पर्व है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य होने का अर्थ केवल अपने लिए जीना नहीं, बल्कि दूसरों के साथ हँसना और जुड़ना भी है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम होली को फिर से उसके मूल अर्थ में देखें। शोर-शराबे और औपचारिकताओं से हटकर, रिश्तों को समय दें। बच्चों को मोहल्लों में खेलने दें, बड़ों को एक-दूसरे से मिलने का अवसर दें और परंपराओं को केवल स्मृति न बनने दें। त्योहार हमें उम्मीद देते हैं। वे अकेलेपन को तोड़ते हैं और जीवन की थकान के बीच कुछ पल की राहत देते हैं। अगर हम इन्हें केवल रस्म बना देंगे, तो समाज और अधिक सूना हो जाएगा। होली के रंग तभी गहरे होंगे, जब दिलों में अपनापन होगा। वरना रंग हाथों से तो उतर जाएँगे, लेकिन रिश्तों पर जमी धूल और गहरी होती चली जाएगी।

शायद अब समय है कि हम रुककर सोचें—
क्या हम फिर से वह होली लौटा सकते हैं,
जहाँ रंगों से पहले रिश्ते खिलते थे?

— डॉ. सत्यवान सौरभ

*डॉ. सत्यवान सौरभ

✍ सत्यवान सौरभ, जन्म वर्ष- 1989 सम्प्रति: वेटरनरी इंस्पेक्टर, हरियाणा सरकार ईमेल: satywanverma333@gmail.com सम्पर्क: परी वाटिका, कौशल्या भवन , बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा – 127045 मोबाइल :9466526148,01255281381 *अंग्रेजी एवं हिंदी दोनों भाषाओँ में समान्तर लेखन....जन्म वर्ष- 1989 प्रकाशित पुस्तकें: यादें 2005 काव्य संग्रह ( मात्र 16 साल की उम्र में कक्षा 11th में पढ़ते हुए लिखा ), तितली है खामोश दोहा संग्रह प्रकाशनाधीन प्रकाशन- देश-विदेश की एक हज़ार से ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशन ! प्रसारण: आकाशवाणी हिसार, रोहतक एवं कुरुक्षेत्र से , दूरदर्शन हिसार, चंडीगढ़ एवं जनता टीवी हरियाणा से समय-समय पर संपादन: प्रयास पाक्षिक सम्मान/ अवार्ड: 1 सर्वश्रेष्ठ निबंध लेखन पुरस्कार हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड भिवानी 2004 2 हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड काव्य प्रतियोगिता प्रोत्साहन पुरस्कार 2005 3 अखिल भारतीय प्रजापति सभा पुरस्कार नागौर राजस्थान 2006 4 प्रेरणा पुरस्कार हिसार हरियाणा 2006 5 साहित्य साधक इलाहाबाद उत्तर प्रदेश 2007 6 राष्ट्र भाषा रत्न कप्तानगंज उत्तरप्रदेश 2008 7 अखिल भारतीय साहित्य परिषद पुरस्कार भिवानी हरियाणा 2015 8 आईपीएस मनुमुक्त मानव पुरस्कार 2019 9 इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ रिसर्च एंड रिव्यु में शोध आलेख प्रकाशित, डॉ कुसुम जैन ने सौरभ के लिखे ग्राम्य संस्कृति के आलेखों को बनाया आधार 2020 10 पिछले 20 सालों से सामाजिक कार्यों और जागरूकता से जुडी कई संस्थाओं और संगठनों में अलग-अलग पदों पर सेवा रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, दिल्ली यूनिवर्सिटी, कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 9466526148 (वार्ता) (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) 333,Pari Vatika, Kaushalya Bhawan, Barwa, Hisar-Bhiwani (Haryana)-127045 Contact- 9466526148, 01255281381 facebook - https://www.facebook.com/saty.verma333 twitter- https://twitter.com/SatyawanSaurabh