होली का रंग हो तुम
जब चाहो प्यार प्रिय मेरे पास चले आना तुम ।
होकर निशंक मेरे मन का द्वार खटखटाना तुम ।
तन कलुषित है भले मेरा
मन तो पावन गंगा है
कोना कोना इसका
तेरे रंग में मैंने रंगा है
सूने मेरे मन मंदिर को अपना घर बनाना तुम
जब चाहो प्यार प्रिय मेरे पास चले आना तुम
तेरे प्रेम की सद्गंध को लेकर
आती है प्रातः पवन
तेरा नाम वेद ऋचा सा
उच्चारित करती है धड़कन
प्रेम यज्ञ कुण्ड की मैं समिधा घृत बन जाना तुम
जब चाहो प्यार प्रिय मेरे पास चले आना तुम
तुम चैत के बसंत मेरे
तुम बरखा का सावन हो
तुम ही हरियाली तीज मेरी
तुम करवा का व्रत पावन हो
होली का रंग हो कभी मेरी चुनर गुलाबी कर जाना तुम
जब चाहो प्यार प्रिय मेरे पास चले आना तुम
— मनोज शाह मानस
