आकांक्षा से उपलब्धि तक: उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था का विस्तारित क्षितिज
उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था एक बड़ा, जटिल और गतिशील तंत्र है, जो देश के दूसरे राज्यों की तुलना में अपने अर्थिक विकास के पैमानों और गति के कारण लगातार सुर्खियों में रहता है। 2020 के दशक की शुरुआत में जिस आर्थिक संरचना को ‘स्थिर लेकिन सीमित क्षमता वाला’ कहा जाता था, आज वह प्रदेश दोहरा आकार वाली अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है, जिसमें कृषि, उद्योग, सेवाएँ, निवेश आकर्षण और सामाजिक संकेतक—सबका संतुलित योगदान दिखता है। उत्तर प्रदेश की यह प्रगति केवल कुछ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक सामाजिक-आर्थिक बदलावों और संरचनात्मक विकास को प्रतिबिम्बित करती है।
सबसे पहले आर्थिक आकार पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश की जीएसडीपी लगातार उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज कर रही है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, राज्य की जीएसडीपी आठ वर्षों में लगभग दोगुनी होकर ₹13.30 लाख करोड़ (2016-17) से बढ़कर ₹30.25 लाख करोड़ (2024-25) तक पहुंच गई। यह वृद्धि केवल सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं बल्कि राज्य की आर्थिक क्षमता में व्यापक विस्तार का संकेत है जो कृषि, उद्योग तथा सेवा क्षेत्रों को साथ में ले रहा है। इसके साथ ही 2025-26 में जीएसडीपी को ₹36 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है, जो दिखाता है कि प्रदेश की अर्थव्यवस्था न सिर्फ बढ़ रही है बल्कि उसके विकास की दर भी मजबूत बनी हुई है।
सरकारी आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय भी पिछले वर्षों में महत्वपूर्ण वृद्धि दर्ज कर चुकी है। 2016-17 में प्रति व्यक्ति आय लगभग ₹54,564 थी, जो 2024-25 में लगभग ₹1,09,844 तक पहुंच चुकी है, और अनुमान है कि 2025-26 में यह सीमा ₹1,20,000 पार कर सकती है। यह वृद्धि केवल अर्थव्यवस्था के आकार को बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रदेश की जनता की क्रय क्षमता, जीवन स्तर और सामाजिक कल्याण में भी सुधार का संकेत देती है।
यह आर्थिक विस्तार केवल जीएसडीपी तक सीमित नहीं है। राज्य की कर आधारित राजस्व क्षमता भी बढ़ी है। राजस्व और बजट की क्षमता में वृद्धि ने सरकार को सामाजिक और बुनियादी ढांचे पर अधिक खर्च करने की सहूलियत दी है। 2025-26 के बजट का आकार लगभग ₹8.33 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, और अपने कर राजस्व में ध्यान देने योग्य वृद्धि दर्ज की गई है जिससे राज्य का कर्ज-से-आय अनुपात भी नियंत्रित स्तर पर है। यह सकल घरेलू उत्पाद के मुकाबले बेहतर वित्तीय संतुलन और दीर्घकालिक निवेश क्षमता का संकेत है।
कृषि, जो उत्तर प्रदेश की पारंपरिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है, वह भी आधुनिक और मूल्य-संवर्धन-केंद्रित दिशा में बड़ा बदलाव दिखा रही है। 2024-25 में कृषि एवं संबद्ध सेवाओं का राज्य की अर्थव्यवस्था में हिस्सा लगभग 25.8 प्रतिशत था, जबकि उद्योग और सेवा क्षेत्रों ने क्रमशः लगभग 27.2 प्रतिशत और 47 प्रतिशत का योगदान दिया है, यह संकेत है कि कृषि अब अकेला प्रमुख खंड नहीं रह गया बल्कि सरकारी प्रोत्साहन, तकनीकी योगदान और मूल्य संवर्धन उपायों के कारण यह अन्य क्षेत्रों के साथ संतुलित रूप से विकसित हो रहा है।
नियमित कृषि उत्पादों के उत्पादन और पारंपरिक कृषि उत्पादकता में भी वृद्धि हुई है। उत्पादकता के विस्तार, सिंचाई के बड़े नेटवर्क और उच्च-मूल्य वाली कृषि परियोजनाओं के परिणामस्वरूप, प्रदेश में खाद्यान्न उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि है। कृषि से जुड़े उद्योगों—जैसे बागवानी, डेरी, मत्स्य पालन और कोल्ड स्टोरेज—में विस्तार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नया आय स्रोत और रोजगार अवसर प्रदान किए हैं, जिससे कृषि-आधारित ग्रामीण रोजगार का स्वरूप बदल रहा है।
निवेश आकर्षण और औद्योगिक विकसित होने की क्षमता भी प्रदेश की आर्थिक कहानी का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश ने लगभग ₹50 लाख करोड़ से अधिक के निवेश प्रस्तावों को आकर्षित किया है। यह निवेशपात्र प्रस्ताव घरेलू और विदेशी दोनों प्रकार के निवेशकों से प्राप्त हुए हैं और यह संकेत देते हैं कि प्रदेश अब बड़े स्तर पर निवेश-अनुकूल माहौल बनाकर वैश्विक निवेश प्रवाह को भी अपने पक्ष में खींच रहा है। इसके अलावा, निवेश प्रक्रियाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स जैसे “निवेश मित्र” के माध्यम से आसान और तेज बनाया गया है, जिससे नए उद्योग और विनिर्माण इकाइयों के लिए भूमि, अनुमति और संरचनात्मक सहायक सुविधाओं का उपलब्ध होना सुगम हो गया है।
उद्योगों के विस्तार में यह भी देखा गया है कि उत्तर प्रदेश में एमएसएमई, विनिर्माण और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्र में महत्वपूर्ण निवेश आकर्षित हो रहे हैं। उदाहरण के तौर पर लखनऊ में हाल का एक MaaS (Manufacturing as a Service) सम्मेलन हुआ, जिसमें ₹3,030 करोड़ के समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए जो अनुमानित रूप से लगभग 2.3 लाख रोजगार अवसर उपलब्द कराएंगे। यह न सिर्फ राज्य में उद्योगों की क्षमता को बढ़ाता है बल्कि रोजगार सृजन में भी प्रत्यक्ष भूमिका निभाता है।
राज्य की निर्यात क्षमता भी तेजी से सुधर रही है। हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिसमें वस्त्र, इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्य प्रसंस्करण वस्तुएँ और हस्तशिल्प जैसे उद्योग शामिल हैं। निर्यात क्षमता में वृद्धि ने राज्य को देश के बहुआयामी अर्थव्यवस्था में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका दी है। निवेश, निर्यात और औद्योगिक आउटपुट में यह संयोजन इस बात का संकेत है कि उत्तर प्रदेश देश के राष्ट्रीय उत्पादन और व्यापार नेटवर्क में अपनी भागीदारी को बढ़ा रहा है।
इसके अलावा, राज्य के सामाजिक संकेतक जैसे वित्तीय समावेशन, खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक वितरण नेटवर्क (PDS) ने भी काफी प्रगति दिखाई है। डीजिटलरण कार्ड, पोर्टेबिलिटी और उचित दर की दुकानों की व्यापकता ने लोगों को सीधे आर्थिक लाभ पहुँचाया है, जिससे गरीबी दर में भी कमी देखने को मिल रही है। उदाहरण के तौर पर बहुआयामी गरीबी दर कम होकर लगभग 17.4 प्रतिशत हो गई है, जो पिछले वर्षों के मुकाबले एक मजबूत सामाजिक प्रगति का संकेत है।
उत्तर प्रदेश की आर्थिक प्रगति की यह कहानी केवल आर्थिक संकेतकों तक सीमित नहीं रहती; इसका असर लोगों के जीवन स्तर, रोजगार अवसरों और डिजिटलीकरण जैसी सामाजिक प्रगति में भी स्पष्ट दिखता है। वित्तीय समावेशन पहलें जैसे जन धन और आयुष्मान भारत कार्ड की व्यापक पहुंच ने आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया है जिससे औपचारिक वित्तीय भागीदारी बढ़ी है।
निष्कर्ष यह है कि उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था सिर्फ व्यापक जीएसडीपी के आंकड़ों के कारण चर्चा का विषय नहीं है, बल्कि वह समग्र, संतुलित और दीर्घकालिक विकास की दिशा में अग्रसर एक विशाल अर्थिक संरचना के रूप में उभर रही है। कृषि, उद्योग, सेवा क्षेत्र, निवेश, सामाजिक संकेतक और निर्यात—इन सभी खंडों के संतुलित विकास ने उत्तर प्रदेश को न केवल राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में एक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है, बल्कि भविष्य के दशक में उच्च-विकास लक्ष्य जैसे $1 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को भी साकार करने की दिशा में मजबूत आधार तैयार किया है।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
