विज्ञान

कृत्रिम मेधा का प्रयोग है जोखिम से भरपूर है, सावधानी आवश्यक

समकालीन सभ्यता-परिवर्तनप्रेरक विज्ञान-प्रौद्योगिकी-विस्फोटकाल में कृत्रिम मेधा—जिसे आधुनिक युग की बुद्धिसमान गणनाशक्ति कहा जा सकता है—मानवता के समक्ष अवसर-विस्तारक किंतु संकट-सम्भावनापरिपूर्ण साधनरूप में उभर रही है। ज्ञान-उत्पादन, चिकित्सा-अनुसंधान, उत्पादकता-वृद्धि, व्यापार-प्रबंधन, सुरक्षा-नियंत्रण, संचार-सुविधा आदि विविध क्षेत्रों में इसके उपयोग ने विकासगति को तीव्र किया है, परन्तु इसी तीव्रता में निहित अनियंत्रित-प्रयोगजन्य जोखिमों की उपेक्षा करना दूरदर्शिताहीनता सिद्ध होगा। अंतरराष्ट्रीय नीतिनिर्माता-संगठनों द्वारा यह स्पष्ट कहा गया है कि कृत्रिम मेधा के लाभ जितने व्यापक हैं, उसके साथ जुड़े जोखिम—जैसे दुष्प्रचार, डेटा-असुरक्षा और कॉपीराइट-उल्लंघन—भी उतने ही गंभीर हैं, इसलिए इसके लिए मानवीय-केंद्रित और उत्तरदायित्व-आधारित दृष्टिकोण अनिवार्य है। इस चेतावनी का आशय यह है कि तकनीकी-उत्साह के आवेग में यदि नियमन-विवेक शिथिल पड़ गया तो वही तकनीक, जो प्रगति का साधन है, सामाजिक असंतुलन का कारण भी बन सकती है।

वैश्विक आँकड़ों से स्पष्ट होता है कि कृत्रिम मेधा का प्रसार अभूतपूर्व वेग से हो रहा है। OECD के आँकड़ों के अनुसार 2023 में जहाँ केवल 8.7% कंपनियाँ AI का उपयोग कर रही थीं, वहीं 2025 तक यह अनुपात बढ़कर 20.2% हो गया—अर्थात् दो वर्षों में उपयोग दोगुने से अधिक हो गया। यह तीव्र विस्तार एक ओर आर्थिक-उत्पादकता की नई संभावनाएँ खोलता है, दूसरी ओर नियमन-व्यवस्था की गति यदि धीमी रही तो तकनीक समाज से आगे निकल जाएगी और वही असंतुलन उत्पन्न होगा जिसे इतिहास में औद्योगिक क्रांति के समय देखा गया था। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ की 2025 की रिपोर्ट ने स्पष्ट कहा कि कृत्रिम मेधा के तीव्र विकास से निपटने हेतु सक्रिय, समावेशी और अनुकूलनशील शासन-व्यवस्था अनिवार्य है।

सबसे अधिक चर्चा जिस जोखिम को लेकर हो रही है वह है रोजगार-विस्थापन-आशंका। अनेक स्वतंत्र अध्ययनों में पाया गया है कि स्वचालन-आधारित प्रणालियाँ विभिन्न उद्योगों में नौकरियाँ घटा रही हैं और श्रमबाज़ार की संरचना बदल रही है। विश्व स्तर पर अनुमान है कि कृत्रिम मेधा लगभग 40% नौकरियों को प्रभावित कर सकती है और विकसित अर्थव्यवस्थाओं में यह प्रभाव 60% तक हो सकता है। 2025 के आँकड़ों के अनुसार 13.7% अमेरिकी श्रमिकों ने बताया कि वे रोबोट या AI-आधारित स्वचालन के कारण नौकरी खो चुके हैं, जबकि 40% नियोक्ता भविष्य में कर्मचारियों की संख्या घटाने की योजना बना रहे हैं जहाँ AI कार्यों को स्वचालित कर सकता है। यह केवल संभावित भविष्य नहीं, बल्कि आरम्भिक वर्तमान है—2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार AI-निवेश के कारण कुछ उद्योगों में हर महीने लगभग 5,000-10,000 नौकरियों का शुद्ध नुकसान दर्ज किया गया। विश्व आर्थिक मंच का अनुमान है कि 2030 तक AI लगभग 9.2 करोड़ नौकरियाँ समाप्त कर सकता है। इन आँकड़ों का संयुक्त संकेत यही है कि यदि कौशल-पुनःप्रशिक्षण और सामाजिक सुरक्षा-व्यवस्था समय पर विकसित नहीं हुई तो तकनीकी प्रगति सामाजिक असमानता को बढ़ा सकती है।

रोजगार-चिंता केवल आर्थिक प्रश्न नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक-सांस्कृतिक प्रभावों से भी जुड़ी है। सर्वेक्षणों से ज्ञात हुआ कि लगभग 56% अमेरिकी वयस्क AI से नौकरी जाने की संभावना को लेकर अत्यधिक चिंतित हैं। कुछ देशों में स्थिति और भी जटिल है—एक अध्ययन में पाया गया कि 74% अधिकारी AI-कौशल को महत्त्वपूर्ण मानते हैं, परंतु केवल 17% कर्मचारियों को ही प्रशिक्षण मिला, जिससे कार्यबल में असमानता की खाई बढ़ रही है। यह स्थिति स्पष्ट संकेत देती है कि तकनीक-सुगम्य-शिक्षित वर्ग और तकनीक-वंचित-अकुशल वर्ग के बीच एक द्विस्तरीय श्रमसंरचना बन सकती है, जो सामाजिक तनाव को जन्म देगी।

कृत्रिम मेधा के जोखिम केवल रोजगार तक सीमित नहीं हैं; सूचना-सत्यता और लोकतांत्रिक-संरचना भी इसके प्रभाव से अछूती नहीं। एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने चेतावनी दी कि AI-निर्मित सामग्री का दुरुपयोग इतिहास-विकृतिकरण और घृणाप्रचार को बढ़ा सकता है, क्योंकि यथार्थ-जैसे दिखने वाले डीपफेक और पाठ-सामग्री तथ्य और कल्पना के बीच अंतर मिटा देते हैं। इसी कारण वैश्विक संस्थाएँ इस तकनीक में पारदर्शिता और मानवीय निगरानी की अनिवार्यता पर बल देती हैं। UNESCO की 194 सदस्य देशों पर लागू AI-नीतिसिफारिशों में मानवाधिकार, गरिमा, पारदर्शिता और निष्पक्षता को केंद्रीय सिद्धांत बताया गया है।

तकनीकी-केन्द्रीकरण-सम्बन्धी जोखिम भी कम गंभीर नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र से सम्बद्ध विश्लेषण बताता है कि अंतरराष्ट्रीय AI-शासन अभी खंडित है और इस क्षेत्र की प्रमुख तकनीक कुछ बड़ी कंपनियों के नियंत्रण में है, जो लाभ को सामाजिक हित पर प्राथमिकता दे सकती हैं। यह केंद्रीकरण आर्थिक-सामरिक शक्ति-संतुलन को प्रभावित कर सकता है और विकासशील देशों को पीछे छोड़ सकता है। विश्व व्यापार संगठन ने भी चेतावनी दी है कि यदि AI के लाभों तक समान पहुँच नहीं हुई तो वैश्विक असमानता बढ़ेगी, क्योंकि तकनीकी संसाधन अभी कुछ समृद्ध देशों में ही केंद्रित हैं।

पर्यावरणीय-प्रभाव-सम्बन्धी पक्ष भी ध्यान देने योग्य है। हालिया अकादमिक अध्ययन के अनुसार कृत्रिम मेधा का पर्यावरणीय पदचिह्न केवल ऊर्जा-उपयोग तक सीमित नहीं, बल्कि यह पारिस्थितिकी, जलसंसाधन, जैवविविधता और सामाजिक-आर्थिक प्रणालियों पर अप्रत्यक्ष प्रभावों की श्रृंखला उत्पन्न कर सकता है, जो जटिल और कभी-कभी अपरिवर्तनीय भी हो सकती है। अर्थात् तकनीकी-सुविधा-आश्रितता यदि अंधाधुंध बढ़ी तो जलवायु-संतुलन और प्राकृतिक संसाधन-सुरक्षा पर भी दबाव बढ़ सकता है।

सांस्कृतिक-सृजनक्षेत्र भी इस परिवर्तन से प्रभावित हो रहा है। 2024 के एक अध्ययन के अनुसार संगीत क्षेत्र के कर्मियों की आय 2028 तक लगभग 25% तक घट सकती है क्योंकि जनरेटिव AI स्वचालित सृजन करने में सक्षम है और पारंपरिक कलाकार तकनीकी प्रशिक्षण के अभाव में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहे। इससे स्पष्ट है कि रचनात्मकता-आधारित पेशे भी अब पूर्णतः सुरक्षित नहीं रहे—एक समय जिन क्षेत्रों को “मानव-विशिष्ट” माना जाता था, वे भी तकनीकी प्रतिस्पर्धा के घेरे में आ रहे हैं।

हालाँकि संतुलित दृष्टिकोण यह भी स्वीकार करता है कि कृत्रिम मेधा केवल संकट का स्रोत नहीं; यह समाधानकारी शक्ति भी है। कुछ शोधों में पाया गया कि AI अपनाने और नौकरी-हानि के बीच सीधा संबंध हर क्षेत्र में समान नहीं होता—उदाहरणतः खुदरा क्षेत्र के एक बहुराष्ट्रीय अध्ययन में उच्च AI-उपयोग के साथ नौकरी-हानि में कमी का संबंध पाया गया, जिससे संकेत मिलता है कि कुछ क्षेत्रों में AI उत्पादकता बढ़ाकर रोजगार स्थिर कर सकता है। अतः समस्या तकनीक नहीं, बल्कि उसका अनियोजित उपयोग है।

इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए विभिन्न सरकारें नियामक-ढाँचे विकसित कर रही हैं। उदाहरणार्थ, 2025 में कैलिफ़ोर्निया ने एक कानून पारित किया जो कंपनियों को अपने AI मॉडलों के संभावित “विनाशकारी जोखिमों” का सार्वजनिक मूल्यांकन प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करता है और सुरक्षा-घटनाओं की रिपोर्टिंग अनिवार्य बनाता है। इसी प्रकार यूरोपीय संघ ने 2024 में AI अधिनियम लागू किया जिसका उद्देश्य मौलिक अधिकारों की रक्षा और भरोसेमंद AI विकास सुनिश्चित करना है। इन नीतिगत पहलों से स्पष्ट है कि वैश्विक समुदाय तकनीक को अनियंत्रित नहीं छोड़ना चाहता।

अतः समग्र विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि कृत्रिम मेधा neither शत्रु है, न ही सर्वसमाधानकारी देवता; वह शक्ति-तटस्थ साधन है जिसका परिणाम उसके प्रयोग की दिशा पर निर्भर करता है। अनियंत्रित-प्रयोग, अनियोजित-विस्तार, अनियमित-शासन और अनैतिक-उद्देश्य—ये चार तत्व यदि साथ आ जाएँ तो वही तकनीक सामाजिक-अस्थिरता का कारण बन सकती है; किंतु नियमन-समर्थित-नवाचार, कौशल-उन्नयन-नीति, पारदर्शिता-आधारित-प्रयोग और मानव-केन्द्रित-दृष्टिकोण अपनाया जाए तो वही तकनीक मानवता के उत्कर्ष का साधन सिद्ध हो सकती है। इसलिए आज आवश्यकता तकनीक-विरोध नहीं, बल्कि विवेक-समन्वित-प्रयोग की है—ऐसा प्रयोग जिसमें विकास और सुरक्षा, नवाचार और नैतिकता, दक्षता और मानवता, सभी का संतुलित समावेश हो। यही संतुलन भविष्य की डिजिटल सभ्यता को स्थिर, न्यायपूर्ण और सुरक्षित बना सकता है।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563