वैश्विक शांति बनाए रखने में एआई की महत्वपूर्ण भूमिका
आज का विश्व अनेक प्रकार के संघर्षों, राजनीतिक तनावों, मानवीय संकटों और संसाधन असमानताओं से जूझ रहा है। ऐसे समय में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) वैश्विक शांति बनाए रखने में सहायक हो सकती है। इस विषय पर चर्चा भावनात्मक नहीं, बल्कि प्रमाणिक तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए। इसलिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की प्रकाशित रिपोर्टों और आधिकारिक दस्तावेजों पर आधारित चर्चा आवश्यक और प्रासंगिक है।
सबसे पहले वैश्विक संघर्ष की स्थिति को समझना आवश्यक है। उप्साला संघर्ष डेटा कार्यक्रम (UCDP) और पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट ओस्लो (PRIO) के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022 में विश्व में 55 राज्य आधारित सशस्त्र संघर्ष दर्ज किए गए। वर्ष 2023 में यह संख्या बढ़कर 59 तक पहुँच गई, जिसे हाल के दशकों का उच्च स्तर माना गया। इसका अर्थ यह है कि दुनिया में सशस्त्र संघर्ष कम नहीं हो रहे हैं, बल्कि कई क्षेत्रों में बढ़ रहे हैं। ऐसे परिदृश्य में समय रहते हिंसा की आशंका को पहचानना और रोकना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) की मिड ईयर ट्रेंड्स 2023 रिपोर्ट के अनुसार जून 2023 तक विश्व में जबरन विस्थापित लोगों की संख्या लगभग 110 मिलियन थी। वर्ष 2023 के अंत तक जारी ग्लोबल ट्रेंड्स रिपोर्ट में यह संख्या 117.3 मिलियन बताई गई। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि युद्ध, आंतरिक संघर्ष और उत्पीड़न के कारण करोड़ों लोग अपने घर छोड़ने को विवश हुए। यदि संघर्षों को पहले चरण में ही रोका जा सके तो विस्थापन की यह संख्या अपेक्षाकृत काफी कम की जा सकती है।
यहीं पर एआई आधारित डेटा विश्लेषण की भूमिका सामने आती है। संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों ने डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन रणनीति के तहत “Unite Aware” नामक प्लेटफॉर्म विकसित किया है। इस प्रणाली के माध्यम से विभिन्न मिशनों से प्राप्त घटनाओं, सुरक्षा सूचनाओं और भू स्थानिक आंकड़ों का विश्लेषण किया जाता है। इसी प्रकार Comprehensive Planning and Performance Assessment System (CPAS) नामक प्रणाली मिशनों के प्रदर्शन और जोखिम का विश्लेषण करती है। इन प्रणालियों का उद्देश्य यह है कि शांति मिशन निर्णय लेने में अधिक सटीक और तथ्य आधारित हो सकें।
संघर्ष के फैलाव में भ्रामक सूचना और घृणा भाषण की भी भूमिका होती है। वर्ष 2018 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के अंतर्गत म्यांमार पर स्वतंत्र तथ्य अन्वेषण मिशन की रिपोर्ट (A/HRC/39/64) में यह उल्लेख किया गया कि सोशल मीडिया पर फैलने वाली घृणात्मक सामग्री ने हिंसा को बढ़ाने में भूमिका निभाई। आज बड़ी डिजिटल कंपनियाँ मशीन लर्निंग आधारित प्रणालियों से ऐसी सामग्री की पहचान करने का प्रयास कर रही हैं। यद्यपि यह व्यवस्था पूर्ण नहीं है, फिर भी यह स्पष्ट है कि एआई तकनीक दुष्प्रचार को सीमित करने में सहायक हो सकती है।
मानवीय सहायता के क्षेत्र में भी एआई का प्रयोग बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था UNITAR के अंतर्गत UNOSAT ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की त्वरित मैपिंग के लिए एआई आधारित उपग्रह चित्र विश्लेषण प्रणाली विकसित की है। इस प्रणाली से आपदा के तुरंत बाद प्रभावित क्षेत्रों की पहचान जल्दी हो जाती है, जिससे राहत कार्यों की गति बढ़ती है। संयुक्त राष्ट्र मानवीय समन्वय कार्यालय (OCHA) ने भी अपनी ब्रीफिंग नोट में यह स्वीकार किया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानवीय कार्यों में डेटा विश्लेषण को अधिक प्रभावी बना सकती है।
खाद्य संकट और संघर्ष के बीच संबंध भी प्रमाणिक रूप से स्थापित है। विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) अपने आधिकारिक दस्तावेजों में स्पष्ट करता है कि विश्व के अनेक गंभीर खाद्य संकटों का मुख्य कारण सशस्त्र संघर्ष है। जब संघर्ष होता है तो खेती, आपूर्ति श्रृंखला और बाजार प्रणाली प्रभावित होती है। यदि एआई आधारित मॉडल कृषि उत्पादन, मौसम परिवर्तन और आपूर्ति व्यवस्था का पूर्वानुमान बेहतर ढंग से कर सकें तो संकट की तीव्रता कम की जा सकती है।
एआई के नैतिक उपयोग को लेकर भी वैश्विक स्तर पर प्रयास हुए हैं। यूनेस्को ने 23 नवंबर 2021 को “Recommendation on the Ethics of Artificial Intelligence” को अपनाया। इस दस्तावेज में मानव अधिकारों की रक्षा, पारदर्शिता, जवाबदेही और डेटा संरक्षण पर विशेष जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एआई का विकास मानव हितों के अनुकूल हो। इसी प्रकार यूरोपीय संघ ने 2024 में एआई एक्ट (Regulation EU 2024/1689) पारित किया, जिसमें उच्च जोखिम वाली एआई प्रणालियों के लिए नियामक ढांचा निर्धारित किया गया है। यह कानून बताता है कि तकनीक को बिना नियंत्रण के छोड़ देना उचित नहीं है।
बहुभाषीय संवाद के क्षेत्र में भी तकनीकी प्रगति हो रही है। संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेजीकरण विभाग ने gText जैसे उपकरण विकसित किए हैं, जो अनुवाद स्मृति और मशीन अनुवाद का उपयोग करते हैं। इससे विभिन्न भाषाओं में आधिकारिक दस्तावेज तैयार करने में सुविधा मिलती है। यद्यपि अंतिम संपादन मानव विशेषज्ञ करते हैं, फिर भी तकनीक संवाद को अधिक तेज और समावेशी बनाती है।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि एआई का उपयोग केवल सकारात्मक नहीं होता। स्वायत्त घातक हथियार प्रणालियों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर बहस चल रही है। अनेक देश संयुक्त राष्ट्र मंचों पर ऐसे हथियारों के नियमन की मांग कर रहे हैं। यदि एआई का उपयोग युद्ध क्षमता बढ़ाने में किया गया तो यह शांति के लिए खतरा बन सकता है। इसलिए तकनीक के विकास के साथ नैतिक और कानूनी ढांचे का सुदृढ़ होना अनिवार्य है।
सार रूप में देखा जाए तो एआई स्वयं शांति की गारंटी नहीं है, लेकिन यह शांति स्थापना की प्रक्रियाओं को अधिक वैज्ञानिक और डेटा आधारित बना सकता है। प्रमाणिक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें बताती हैं कि विश्व में संघर्ष और विस्थापन की स्थिति गंभीर है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य संस्थाएँ डेटा विश्लेषण, उपग्रह निगरानी और डिजिटल उपकरणों का उपयोग कर रही हैं। यदि इन प्रणालियों का उपयोग पारदर्शिता, मानव अधिकारों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ किया जाए तो एआई वैश्विक शांति प्रयासों को मजबूत कर सकता है।
अंततः तकनीक का मूल्य इस बात से तय होता है कि उसका उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है। यदि एआई को मानवीय गरिमा, न्याय और सहयोग के सिद्धांतों के साथ जोड़ा जाए तो यह वैश्विक शांति का समर्थ साधन बन सकता है। परंतु यदि इसका उपयोग प्रतिस्पर्धा, हथियार निर्माण या निगरानी के लिए किया गया तो इसके परिणाम विपरीत भी हो सकते हैं। इसलिए आवश्यक है कि विश्व समुदाय एआई को मानव केंद्रित दृष्टिकोण से अपनाए और शांति को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
