क्या ईरान को कमजोर समझने में इजराइल-अमेरिका से गलती हुई
पिछले कुछ दिनों की खबरों ने पश्चिम एशिया को ऐसी जगह ला खड़ा किया है जहाँ एक सवाल हर चर्चा के केंद्र में है: क्या ईरान पर हमला करके इज़राइल और अमेरिका ने रणनीतिक गलती कर दी। 28 फ़रवरी 2026 को दोनों देशों ने ईरान पर हमलों की एक श्रृंखला शुरू की, जिनका लक्ष्य ईरान के नेतृत्व और सुरक्षा ढांचे, उसके परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल स्थलों पर प्रहार बताकर रखा गया। यूके की संसदीय ब्रीफिंग में भी यही कहा गया है कि हमले नेतृत्व, सुरक्षा बलों, परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल साइटों पर केंद्रित थे। लेकिन जैसे जैसे घटनाएँ आगे बढ़ीं, यह भी सामने आया कि यह टकराव एक सीमित सैन्य कार्रवाई नहीं रहा। यह क्षेत्रीय स्तर पर फैलने लगा, और इसके साथ ऊर्जा मार्ग, खाड़ी के देश, अमेरिकी ठिकाने और कई शहर एक साथ जोखिम में आ गए।
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ी बात यह दिखती है कि ईरान को अपेक्षा से कम शक्तिशाली मान लिया गया। पहली गलत धारणा यह थी कि अगर शीर्ष नेतृत्व को समाप्त कर दिया जाए तो ईरान जल्दी टूट जाएगा और घुटने टेक देगा। पर इस धारणा के खिलाफ संकेत खुद अमेरिकी सुरक्षा आकलन में दिखाई देते हैं। रॉयटर्स के अनुसार अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी की एक इंटेलिजेंस असेसमेंट में चेतावनी दी गई कि ईरान या उससे जुड़े समूह अमेरिका के खिलाफ प्रतिशोधी कदम उठा सकते हैं, जिनमें लक्षित हमले और कम स्तर के साइबर हमले भी शामिल हो सकते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि नेतृत्व को नुकसान पहुँचने के बाद भी तंत्र केवल कमजोर नहीं होता, कई बार वह बदले की रणनीति को और फैलाकर चलाता है। यह भी एक तथ्य है कि युद्ध जैसी स्थिति में किसी एक व्यक्ति या एक केंद्र पर प्रहार करके पूरे राज्य ढांचे के टूटने की उम्मीद अक्सर गलत निकलती है, क्योंकि संस्थागत ढाँचे उत्तराधिकार और निर्णय निरंतरता के लिए तैयार रहते हैं।
दूसरी गलत धारणा यह थी कि ईरान की ताकत को केवल पारंपरिक सेना और कुछ ठिकानों से मापा गया। जबकि ईरान की असली क्षमता कई स्तरों पर काम करती है। उसकी प्रतिक्रिया का स्वरूप केवल सीधी लड़ाई तक सीमित नहीं रहता। खबरों में यह बात लगातार आई कि ईरान की जवाबी कार्रवाई और उससे जुड़े संघर्ष क्षेत्र के कई देशों तक फैल गए। जब किसी देश के पास मिसाइल और ड्रोन जैसे साधन हों और साथ ही क्षेत्र में मित्र समूह और प्रभाव के रास्ते मौजूद हों, तब संघर्ष एक जगह नहीं रुकता। यही कारण है कि इस टकराव के साथ साथ कई देशों में सुरक्षा चिंता बढ़ी और सामान्य लोग भी इस संकट की चपेट में आने लगे।
तीसरी गलती यह रही कि मानवीय और सामाजिक प्रतिक्रिया को गलत पढ़ा गया। अक्सर यह सोच लिया जाता है कि हमला जितना बड़ा होगा, विरोधी समाज उतना ही तेजी से टूटेगा। लेकिन इतिहास और वर्तमान दोनों में यह भी देखा जाता है कि बाहरी हमला कई बार देश के भीतर एकजुटता, क्रोध और प्रतिशोध की भावना बढ़ा देता है। इस संघर्ष में हताहतों के प्रारंभिक आँकड़े बहुत भारी बताए गए हैं। अल जज़ीरा की AJLabs ट्रैकर रिपोर्ट ने 1 मार्च को ईरान में 555 मौतों के प्रारंभिक आँकड़े प्रकाशित किए और इज़राइल तथा अन्य क्षेत्रों में भी मौतों का उल्लेख किया। गार्डियन की रिपोर्टिंग में भी ईरान में 550 के आसपास मौतों का संकेत मिलता है। ऐसे बड़े नुकसान के बाद यह मान लेना कि ईरान तुरंत झुक जाएगा, व्यवहारिक नहीं लगता। बल्कि यह संभव है कि नुकसान का पैमाना और जन भावनाएँ राज्य को अधिक कठोर और अधिक आक्रामक रुख अपनाने की तरफ धकेलें।
चौथी और बहुत गंभीर गलती ऊर्जा भू राजनीति को हल्के में लेना है। इस क्षेत्र में हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य केवल एक समुद्री रास्ता नहीं है, यह दुनिया के लिए आर्थिक नाड़ी जैसा है। यदि इस पर संकट बढ़ता है तो उसका असर तेल, गैस, बीमा, शिपिंग और अंततः आम आदमी की महंगाई तक पहुँचता है। 3 मार्च की अल जज़ीरा लाइव रिपोर्टिंग में यह बात सामने आई कि ईरान की ओर से हॉर्मुज़ को बंद करने की घोषणा या कदम का उल्लेख हुआ। यह वही बिंदु है जहाँ सैन्य निर्णय का मूल्यांकन केवल युद्धक्षेत्र में नहीं, वैश्विक अर्थव्यवस्था के संदर्भ में भी होना चाहिए। यदि इस तरह का संकट लंबा चला तो दुनिया भर के बाजारों, उद्योगों और सामान्य परिवारों पर इसका असर बढ़ सकता है।
पाँचवीं गलती यह भी दिखती है कि संघर्ष के समय और अवधि को लेकर बहुत आशावादी आकलन किया गया। रॉयटर्स के अनुसार इज़राइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कहा कि युद्ध कुछ समय ले सकता है, लेकिन वर्षों नहीं। ) इसी तरह रॉयटर्स रिपोर्टिंग में यह भी आया कि अमेरिकी पक्ष ने अपने हताहतों की संख्या छह सर्विस मेंबर तक पहुँचने की बात कही, और यह संकेत दिया कि आगे और नुकसान संभव हैं। इसका सीधा अर्थ है कि यह अभियान केवल एक या दो दिन की कार्रवाई नहीं रहा। यदि वास्तविकता लंबी लड़ाई की तरफ जाती है, तो शुरू में किए गए रणनीतिक अनुमान का मूल्यांकन और भी कठोर हो जाता है, क्योंकि लंबी लड़ाई में लागत लगातार बढ़ती है और राजनीतिक समर्थन भी बदलता है।
अब प्रश्न यह है कि गलती किस अर्थ में। यदि लक्ष्य यह था कि ईरान जल्दी डर जाएगा, नेतृत्व हटने से राज्य ढांचा निष्क्रिय हो जाएगा, जवाबी क्षमता टूट जाएगी और क्षेत्र में खतरा घट जाएगा, तो उपलब्ध रिपोर्टिंग के आधार पर यह लक्ष्य कम से कम अभी तक सिद्ध नहीं होता। उलटा, रिपोर्टिंग यह दिखाती है कि प्रतिशोध का खतरा बना हुआ है और वह केवल एक जगह केंद्रित नहीं है। अमेरिकी DHS की चेतावनी, क्षेत्र में फैलते हमले, हॉर्मुज़ का संकट और बढ़ते हताहत इसी बात की ओर संकेत करते हैं। अगर लक्ष्य यह था कि ईरान की मिसाइल क्षमता और परमाणु महत्वाकांक्षा पर निर्णायक रोक लगे, तो भी रॉयटर्स की रिपोर्टिंग यह बताती है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के उद्देश्यों और तर्कों में समय के साथ बदलाव का उल्लेख हुआ है, यानी लक्ष्य निर्धारण और संदेश एक जैसा नहीं रहा। लक्ष्य जब स्पष्ट नहीं रहता या बदलता दिखता है, तब रणनीतिक स्पष्टता भी कमजोर होती है और दुनिया भर में भरोसा तथा विरोध दोनों बढ़ते हैं।
इसलिए आज की तारीख में, खबरों के आधार पर एक संतुलित निष्कर्ष यह बनता है कि ईरान को कम शक्तिशाली समझकर हमला करने वाली धारणा एक जोखिम भरा आकलन था। ईरान का तंत्र व्यक्ति आधारित भी है और संस्था आधारित भी, और उसके पास बहुस्तरीय प्रतिक्रिया की क्षमता है। इसी वजह से शीर्ष नेतृत्व को नुकसान पहुँचने के बाद भी प्रतिशोध की आशंका खत्म नहीं होती, बल्कि नए रूपों में सामने आ सकती है। और जब युद्ध की आग खाड़ी देशों, ऊर्जा मार्गों और अंतरराष्ट्रीय ठिकानों तक फैलने लगती है, तब एक देश के खिलाफ कार्रवाई का मतलब पूरे क्षेत्र और दुनिया के लिए अनिश्चितता बढ़ जाना होता है। यह अनिश्चितता ही वह संकेत है जो बताती है कि शुरुआती आकलन में कहीं न कहीं भारी चूक हुई है।
यदि इस संकट को आगे और बड़ा होने से रोकना है, तो अब निर्णायक प्रश्न युद्ध जीतने का नहीं, युद्ध रोकने का है। क्योंकि हर गुजरते दिन के साथ हताहत, आर्थिक लागत, क्षेत्रीय अस्थिरता और वैश्विक तनाव बढ़ते हैं। और यह बोझ अंततः सरकारों से अधिक आम नागरिकों पर पड़ता है। आज की रिपोर्टिंग यही संकेत देती है कि यह संघर्ष जितना लंबा खिंचेगा, उतना ही यह साबित होता जाएगा कि “एक त्वरित झटका देकर ईरान को झुका देने” की सोच वास्तविकता से दूर थी।
— पूनम चतुर्वेदी शुक्ला
