नमक का हक़
पंद्रह साल से रमेसर उनके घर में था। सेठ हरिप्रसाद उसे बेटे की तरह मानते थे — कम से कम यही कहते थे।
रमेसर सब जानता था — कहाँ तिजोरी है, कहाँ चाबी रखती हैं मालकिन, किस रात कोई नहीं रहता।
“रमेसर, तू तो घर का हिस्सा है।” सेठजी अक्सर कहते।
“हाँ सेठजी, घर का ही हिस्सा हूँ।” रमेसर मुस्कुराता।
वह मुस्कान अब पुलिस की फ़ाइल में थी।
सोमवार की रात — जब सेठजी तीर्थ पर थे — चार आदमी आए। ताले टूटे नहीं, खुले। दरवाज़ा तोड़ा नहीं, खुला मिला। तिजोरी की चाबी कहाँ थी, सब जानते थे।
इंस्पेक्टर ने रमेसर को बुलाया।
“उस रात तू कहाँ था?”
“घर पर।”
“किसके घर पर?”
रमेसर की आँखें झुक गईं। सेठजी को अब समझ आया — वह पंद्रह साल से नमक नहीं, मौका खा रहा था।
जिस थाली में खाया, उसी में छेद किया — इतनी सफ़ाई से कि थाली को पता भी न चला।
विश्वास आँखों से नहीं, नीयत से परखा जाता है — पर नीयत दिखती तब है जब बहुत देर हो चुकी होती है।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
