ऐ जिंदगी
ऐ जिंदगी तूने हरदम
भरपूर साथ निभाया है,
जरा फुर्सत से बैठ और कर आकलन
मैंने क्या खोया क्या पाया है,
अमीरी गरीबी और घर देख
किसी को भेजना आपके बस में नहीं,
कोई घिसट रहा अव्यवस्था,गालियों के बीच
तो कोई खेल रहा आनंद और सुयश में कहीं,
आपका काम तो भरपूर वक्त देना है,
अब इंसान छांटे क्या छोड़ना क्या लेना है,
कष्टों से भरे जहां में
कोई बचपन की खेल व मौज मस्ती चुना,
तो कोई समय गंवाकर अपना सिर धुना,
अभावों में भी रहकर कोई पढ़ा आगे बढ़ गया,
ऊंचाइयां छुए और इतिहास गढ़ गया,
तो कुछ दुर्गुणों को अपनाते रह गए,
ताउम्र पछताते रह गए,
अपनी व्यथा मसाले लगा सुनाते रह गए,
तो कुछ जानबूझ जान गंवाते रह गए,
कर आज मेरा भी आकलन
आपने बचपन से सब कुछ देखा है,
बता ऐसा क्या है जिसे मैं अपना तो सकता था
पर हाथ में पाकर नादानी में फेंका है,
ऐ जिंदगी बता तो जरा,
अगर भूल हुई है तो आज उसे पहचान लूंगा,
जो राह छूट गई थी उसे फिर से थाम लूंगा,
ऐ जिंदगी तेरे दिए हर पल को अब सार्थक बनाऊंगा,
उतर चुकी पटरी पर लौट आऊंगा।
— राजेन्द्र लाहिरी
