वैश्विक रामायण नेटवर्क : एक सांस्कृतिक कूटनीति का केंद्र
रामायण केवल एक ग्रंथ नहीं है — यह एक सभ्यतागत लहर है जो भारत की सीमाओं से परे, सदियों पूर्व, समुद्र पार कर दर्जनों देशों में फैल चुकी थी। आज जब अयोध्या एक नई वैश्विक पहचान के साथ उदय हो रही है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है — क्या अयोध्या उस विशाल रामायण-सभ्यता का केंद्र-बिंदु बन सकती है जो 50 से अधिक देशों में किसी न किसी रूप में जीवित है? उत्तर है — न केवल यह संभव है, यह घटित हो रहा है।
थाईलैंड — जहाँ राम नाम है राष्ट्रीय उपाधि : थाईलैंड में रामायण “रामकियेन” के रूप में राष्ट्रीय महाकाव्य का दर्जा रखती है। थाई राजाओं की उपाधि स्वयं “राम” पर आधारित है — वर्तमान शासक राम दशम (Rama X) हैं। 1347 में स्थापित थाईलैंड की पुरानी राजधानी “आयुत्थया” (Ayutthaya) अयोध्या के नाम पर ही रखी गई थी। 1767 में बर्मी आक्रमण से इस नगर के विनाश तक यह दक्षिण-पूर्व एशिया के महानतम नगरों में से एक था। आज भी थाईलैंड में शास्त्रीय नृत्य-नाट्य में रामकियेन का केंद्रीय स्थान है। जुलाई 2024 में थाईलैंड में “International Ramayana Festival” आयोजित हुआ जिसमें भारत, कंबोडिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर और थाईलैंड के सांस्कृतिक दलों ने भाग लिया।
इंडोनेशिया — मुस्लिम बहुल देश, रामायण का हृदय : इंडोनेशिया विश्व का सबसे बड़ा मुस्लिम-बहुल देश है — फिर भी रामायण यहाँ सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग है। जावा में 9वीं शताब्दी के अंत तक रामायण लोकप्रिय हो चुकी थी, जिसका प्रमाण प्रंबनन के भव्य मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई रामायण-श्रृंखला है। बाली में रामकथा आज भी धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का केंद्र है। इंडोनेशियाई “वेयांग कुलित” (छाया-कठपुतली) में रामायण और महाभारत के प्रसंग अनिवार्य रूप से शामिल हैं। Arahas Technologies के नेतृत्व में Bali में 2024 में “Global Ramayana Week Festival” आयोजित हुआ। Indian Council for Cultural Relations (ICCR) International Ramayana Festival के माध्यम से इन देशों के साथ सांस्कृतिक संबंधों को और गहरा कर रहा है।
कंबोडिया — अंकोरवाट की दीवारों पर रामायण : कंबोडिया में 12वीं सदी का अंकोरवाट मंदिर विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक स्थल है — और उसकी दीवारों पर “बाली का युद्ध” (Battle of Lanka) की श्रृंखला रामायण की वैश्विक उपस्थिति का सबसे प्रभावशाली प्रमाण है। कंबोडिया में रामायण “रामकेर्ति” (Ramakerti) के रूप में जानी जाती है। सातवीं सदी के एक संस्कृत शिलालेख में कंबोडिया में रामायण के दैनिक पाठ का उल्लेख है — थाई शोधकर्ताओं के अनुसार यह महाकाव्य 6वीं शताब्दी में दक्षिण-पूर्व एशिया पहुँचा। लाओस में “फ्रा लाक फ्रा राम” (Phra Lak Phra Ram) के नाम से यह उपस्थित है।
फिजी और कैरेबियाई देश — गिरमिटिया लेकर गए रामायण : 19वीं सदी में जब ब्रिटिश शासन ने भारत के लाखों मजदूरों को — जिन्हें “गिरमिटिया” कहा गया — फिजी, मॉरीशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो, गयाना, जमैका और अन्य कैरेबियाई देशों में भेजा — तब वे अपने साथ क्या ले गए? बहुत कुछ छूट गया — लेकिन तुलसीदास की रामचरितमानस और हनुमान चालीसा नहीं छूटी। इन मजदूरों का बहुमत उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी क्षेत्र से था। आज फिजी में लगभग 2,000 रामायण-मंडलियाँ सक्रिय हैं। मॉरीशस को “रामायण की भूमि” कहा जाता है। Spectrum Books के एक अध्ययन के अनुसार विश्वभर में रामायण के लगभग 300 संस्करण प्रचलित हैं।
भारत की “रामायण कूटनीति” और अयोध्या की भूमिका : Journal of International Relations and Foreign Policy (2024) में प्रकाशित प्रियंका पांडेय के शोध-पत्र “Ramayana Diplomacy: Strengthening India’s Relation with South East Asia” के अनुसार भारत सरकार ने “Group of Ramayana Nations” की अवधारणा प्रस्तावित की है जिसमें इंडोनेशिया, अमेरिका, ब्रिटेन, रूस और मलेशिया के विशेषज्ञ शामिल होंगे। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने रामायण को एक सांस्कृतिक के बजाय एक कूटनीतिक उपकरण के रूप में सुदृढ़ किया है। ICCR का International Ramayana Festival — जिसमें थाईलैंड, सिंगापुर, कंबोडिया, फिजी, भूटान, त्रिनिदाद और टोबैगो, मलेशिया, श्रीलंका, नेपाल और कई अन्य देश भाग ले चुके हैं — इस कूटनीति की मूर्त अभिव्यक्ति है। “Ramayana Circuit” के माध्यम से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के रामायण-संबंधित स्थलों को पर्यटन और सांस्कृतिक नेटवर्क से जोड़ने की योजना है।
अयोध्या इस वैश्विक नेटवर्क का स्वाभाविक केंद्र है। राम की जन्मभूमि होने के नाते यह नगर न केवल भारत के, बल्कि उन सभी देशों के लिए एक तीर्थस्थल है जहाँ रामायण की जीवंत परंपरा है। थाईलैंड की आयुत्थया, इंडोनेशिया का प्रंबनान, कंबोडिया का अंकोरवाट, फिजी की रामायण-मंडलियाँ — ये सब उस विशाल सांस्कृतिक वृक्ष की शाखाएँ हैं जिसकी जड़ें अयोध्या में हैं। और आज जब यह जड़ नई मिट्टी, नई ऊर्जा और नई पहचान पा रही है, तो उन शाखाओं में भी नई हरियाली आ रही है।
— पूनम चतुर्वेदी शुक्ला
