ग़ज़ल
ये नहीं सिम्त चार अभी कम है
मुझमें ही ये बहार अभी कम है
जानती ख़ुशगवार दुनिया भी
मेरा दिल ख़ुशगवार अभी कम है
प्यार उसका ज़रूर पाऊँगा
मेरा ये इन्तज़ार अभी कम है
वो न मेरा हुआ मगर उस पर
कम कभी था न प्यार अभी कम है
दूर इससे क़रार है शायद
क्योंकि दिल बेक़रार अभी कम है
ग़म ज़ियादा दिए हमें इसने
ये जहां ग़मगुसार अभी कम है
तोड़ने पर लगा ज़माना दिल
टूट जाता कि वार अभी कम है
— केशव शरण
