कविता

इच्छा मृत्यु

“आनंद” भरे जीवन में आई एक बेहद काली शाम,
बस बन कर रह गया जीवन जन्म-मृत्यु का संग्राम,
रक्षाबंधन का वो दिन था बहन ने दी भाई को बधाई,
विधाता के लेख से कुछ घंटों बाद घायल हुआ भाई ।

एक पल में सपनों का संसार शीशे की तरह हुआ चूर,
कोमा में हरीश आया और असहाय दर्द बना नासूर,
अब जागेगा लाल मेरा मॉं का मन हर बार ये कहता,
बाप का दिल जवान बेटे को मौन देख-देख बस रोता ।

छोटे भाई ने खोया सिर पर बड़े भाई का आशीष हाथ,
बहन की ऑंखों में थमते नहीं आंसू कैसा संकट नाथ,
13 वर्षों तक की तपस्या दिन-रात करी सबने सेवा,
बेहतरीन इलाज करवाया कमी नहीं कोई सुरक्षा दवा ।

दिन पर दिन यह दुःख होता गया और अधिक गहरा,
हुई नहीं हरीश में कोई हलचल बढ़ता गया बस अंधेरा,
आखिर अंत में सुप्रीम कोर्ट से परिवार ने की गुहार,
इच्छा मृत्यु दे दो तड़प रहा है मेरा बेटा होकर लाचार ।

सुप्रीम कोर्ट ने दुःखी मन से इस केस पर हॉं करी,
इच्छा मृत्यु हरीश को शायद देना चाहते है श्री हरी,
बुझे मन से मॉं ने कहा सुकून की नींद सो जाना लाल,
माफ़ी मॉंग रही हूॅं बेटा रख नहीं सकी मैं तेरा ख्याल ।
(हरीश राणा का केस और सुप्रीम कोर्ट की हॉं )

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु