राजनीति

भारत और ईरान युद्ध : 90 लाख प्रवासी, LPG संकट और रणनीतिक चुप्पी का हिसाब

आज जब यह लेख लिखा जा रहा है, तब खाड़ी के आसमान में मिसाइलें उड़ रही हैं और होर्मुज की समुद्री सड़क बंद है। इस युद्ध के 15 दिनों में भारत के लिए जो कुछ बदला है वह कोई दूर देश की खबर नहीं है — यह भारत की आंतरिक अर्थव्यवस्था, उसके प्रवासी नागरिकों की सुरक्षा, उसकी ऊर्जा आपूर्ति और उसकी वैश्विक कूटनीतिक साख — इन सबको सीधे प्रभावित कर रही है। IEA की 13 मार्च की रिपोर्ट में एक विशेष चिंता भारत के बारे में है — LPG और नेफ्था की आपूर्ति बाधित होने से खाना पकाने वाली गैस की कमी ‘विशेषकर भारत और पूर्वी अफ्रीका में’ होगी। भारत में 32 करोड़ से अधिक उज्ज्वला योजना के लाभार्थी हैं जो LPG पर निर्भर हैं। अगर आपूर्ति में लंबे समय तक बाधा रही तो यह एक सामाजिक और राजनीतिक चुनौती भी बन सकती है।

ऊर्जा संकट का सबसे तत्काल असर तेल की कीमतों के रूप में सामने आ रहा है। ब्रेंट कच्चा तेल, जो युद्ध से पहले 65-71 डॉलर प्रति बैरल था, 120 डॉलर के करीब पहुँचा और अभी 90-94 डॉलर पर है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85-87 प्रतिशत आयात से पूरा करता है। तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की वृद्धि से भारत का आयात बिल सालाना लगभग 12-15 अरब डॉलर बढ़ जाता है। यह सीधे चालू खाता घाटे पर दबाव डालेगा जो पहले से ही 2025 की चौथी तिमाही में GDP के 2.8 प्रतिशत तक था। रुपये पर दबाव बढ़ेगा। पेट्रोल-डीजल की कीमतें, जो चुनावी राजनीति के कारण अक्सर नियंत्रित रखी जाती हैं, लंबे समय तक नहीं रोकी जा सकेंगी। आम आदमी की जेब पर सीधी मार पड़ेगी और महंगाई का सिलसिला और तेज होगा। RBI को ब्याज दरें घटाने में और देरी करनी होगी क्योंकि ऊर्जा-जनित मुद्रास्फीति पर मौद्रिक नीति का असर सीमित होता है।

90 लाख प्रवासी — भारत की सबसे बड़ी तत्काल चिंता
UAE, सऊदी अरब, कुवैत, कतर, बहरीन और ओमान में मिलाकर 90 लाख से अधिक भारतीय प्रवासी काम करते हैं। यह दुनिया में किसी भी देश का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है। इनसे भारत को हर साल 40 अरब डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा प्रेषण मिलता है। ये लोग केरल, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, तमिलनाडु और अन्य राज्यों के लाखों परिवारों की आजीविका का आधार हैं। अब इनमें से कई अपने रोजगार, सुरक्षा और भविष्य को लेकर असुरक्षित हैं। UAE में इजराईल समर्थित मिसाइल प्रक्षेपण विफल किए गए, बहरीन में मिसाइल से एक महिला मारी गई, कुवैत में अमेरिकी दूतावास बंद है — ये सब वे देश हैं जहाँ लाखों भारतीय रहते और काम करते हैं। भारत सरकार ने ‘ऑपरेशन सहायता’ की तरह एक निकासी योजना बनाई है और एयर इंडिया सहित कई एयरलाइनों ने खाड़ी उड़ानें सीमित की हैं। लेकिन बड़े पैमाने पर निकासी न तो व्यावहारिक है और न ही इन परिवारों के लिए आर्थिक रूप से संभव है।

भारत के लिए चाबहार बंदरगाह, जो ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में है और जिसमें भारत ने अरबों रुपए का निवेश किया है, इस युद्ध के कारण एक अनिश्चित भविष्य में है। चाबहार से भारत का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य था — पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक अपनी पहुँच बनाना। अब जब ईरान में युद्ध चल रहा है और भारत ने अमेरिका के साथ करीबी संबंध बनाए हुए हैं, तब चाबहार परियोजना और उस पर अमेरिकी प्रतिबंधों का खतरा और बढ़ गया है। भारत-मध्य-पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जो 2023 के G20 में भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता था, अब अनिश्चितता में फँसा है। पूरे मध्य-पूर्व में आर्थिक और भौतिक बुनियादी ढाँचे की बाधाएँ इस महत्वाकांक्षी परियोजना को पीछे धकेल रही हैं।

रणनीतिक चुप्पी — भारत का मौन और उसकी कीमत
भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया इस युद्ध पर बेहद संयमित रही है। विदेश मंत्रालय ने संयम और संवाद की अपील की है, प्रधानमंत्री कार्यालय ने ‘सभी पक्षों से शांति’ का आग्रह किया है लेकिन अमेरिका-इजराईल के हमलों की सीधी आलोचना नहीं की। The Diplomat की फरवरी 2026 की रिपोर्ट के अनुसार यह मौन भारत की वैश्विक दक्षिण नेतृत्व की छवि को कमजोर करता है। वे देश जो अमेरिकी शक्ति के मनमाने उपयोग के खिलाफ भारत से एक मजबूत आवाज की उम्मीद कर रहे थे, उन्हें निराशा हुई। इसी के साथ, जो देश अमेरिका के करीब हैं उनके लिए भारत का यह मौन ‘कूटनीतिक परिपक्वता’ है। यही है भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की असली परीक्षा — हर कोई इसे अपनी दृष्टि से देखता है।

लेकिन कुछ व्यावहारिक कदम हैं जो भारत को तुरंत उठाने चाहिए। पहला — खाड़ी में अपने प्रवासियों की सुरक्षा के लिए एक स्पष्ट, सक्रिय और पारदर्शी आपातकालीन योजना बनाना और उसे सार्वजनिक करना। दूसरा — तेल की वैकल्पिक आपूर्ति के लिए रूस, अफ्रीका और अमेरिका से समझौते तेज करना। तीसरा — LPG की घरेलू कमी से निपटने के लिए उज्ज्वला परिवारों के लिए त्वरित राहत व्यवस्था। चौथा — IMEC परियोजना को वैकल्पिक मार्गों से पुनर्जीवित करने की दिशा में यूरोप और खाड़ी भागीदारों से संवाद। भारत इस युद्ध को नहीं रोक सकता, लेकिन अपनी तैयारी और अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए वह जरूर सक्रिय हो सकता है। विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दायित्व केवल GDP की संख्या नहीं, अपने नागरिकों की सुरक्षा और विश्व में एक जिम्मेदार शक्ति की भूमिका निभाना भी है।

— पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

संस्थापक-निदेशक न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन’ एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन ईमेल: Founder@SrijanSansar..com मोबाइल: +91-9312053330