कविता
लड़कियों ने
बहुत जल्दी सीख लिया—
घर से बाहर निकलना,
ऑफिस जाना,
बैंक में पैसा जमा करना,
गैस सिलेंडर बुक करना, लाना,
बिजली का बिल भरना,
गाड़ी चलाना।
उन्होंने
समय के साथ
दुनिया के सारे काम
सीख लिए।
और मिला लिया कदम से कदम।
पर लड़के
अब तक नहीं सीख पाए
समेटना घर को
घर के भीतर छूटे
उन छोटे-छोटे कामों को पूरा करना।
अगर औरत से जाते-जाते
दूध खुला रह जाए,
तो उसे ढक देना।
ठंडा होने पर
उसे फ्रिज में रख देना।
अलगनी पर सूखते कपड़े
उतार कर तह कर देना।
प्रेस के लिए
कपड़े अलग रख देना।
गीला तौलिया
धूप में सूखने डाल देना।
लड़कियों ने
कमाना भी सीख लिया है,
पर लड़के
अब भी नहीं सीख पाए
घर चलाना।
लड़कियों के लिए
हमेशा से तय रही
एक लंबी यात्रा—
पापा की राजकुमारी,
माँ की समझदार बेटी,
फिर बहू,
पत्नी
और अंततः माँ।
हर भूमिका के साथ
उनके हाथ में थमा दी गई
एक मोटी-सी नियमावली—
क्या करना है,
क्या नहीं करना है।
कैसे बोलना है,
कब चुप रहना है।
क्या पहनना है,
क्या नहीं पहनना है।
कितना हँसना है,
कितना झुकना है।
पर लड़के…
वे हर भूमिका में
बस पुरुष ही बने रहे।
उनके लिए
मर्द होना ही
मानो
अंतिम मंज़िल था।
नियमो की किताब
कभी उनके हाथ में आई ही नहीं,
क्योंकि समाज ने
उन्हें जन्म से ही
छूट का विशेषाधिकार दे रखा था।
— प्रज्ञा पाण्डेय मनु
