राजनीति

नकारात्मक शक्तियों की लड़ाई

हमारे हिसाब से वर्तमान युद्ध को रोकने का एक ही तरीका है कि तमाम इस्लामिक देश इज़राइल के अस्तित्व को स्वीकार करें, और अपने यहाँ से चलने वाले आतंकवादी संगठनों पर लगाम लगाएँ। दूसरी तरफ़ अमेरिका विश्व का चौधरी बनने का नाटक बंद करे और दुनिया को चैन से जीने दे।
गणित हमें बहुत भ्रामक सूचनाएँ देता है। यहाँ दो निगेटिव मिलकर एक पॉज़िटिव हो जाते हैं, मगर असल जीवन में ऐसा कुछ नहीं होता। यहाँ जब नकारात्मक शक्तियाँ आमने-सामने होती हैं तो विश्व विनाश के कगार पर आ खड़ा होता है।
अमेरिका और ईरान के युद्ध पर कोई भी टिप्पणी करने से पहले हमें समझना होगा कि इन दोनों देशों की भीतरी सच्चाई क्या है। समस्या यह हो जाती है कि अमेरिका बात तो करता है लोकतंत्र और आज़ादी की, मगर उसके कारनामे बिल्कुल अलग तरह के होते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका की भूमिका बहुत विवादास्पद रही है। सी.आई.ए. द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेज़ों से पता चलता है कि-
1953 में ईरान में तत्कालीन प्रधानमंत्री मुहम्मद मोसादेक ने खनिज तेल का राष्ट्रीयकरण कर दिया। सी.आई.ए. तुरंत हरकत में आ गई और ऑपरेशन एजेक्स में जुट गई। प्रधानमंत्री मुहम्मद मोसादेक को सत्ताच्युत कर दिया गया और उनके स्थान पर तानाशाह शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को गद्दी पर बिठा दिया गया।
1954 की बात है, जब ग्वाटेमाला में राष्ट्रपति याकोबो आर्बेन्स ने भूमि सुधार के नियम लागू करने की घोषणा की, जिनके कारण यूनाइटेड फ्रूट कंपनी के मुनाफ़ों पर असर पड़ने लगा। सी.आई.ए. ने ऑपरेशन पी.बी. सक्सेस के ज़रिए राष्ट्रपति याकोबो को सत्ता से बाहर कर दिया। उनके स्थान पर सैनिक तानाशाही लागू कर दी गई। दो लाख से अधिक ग्वाटेमाला के नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया गया।
1961 में कांगो में वहाँ के प्रधानमंत्री पैट्रिस लुमुम्बा ने यूरेनियम का राष्ट्रीयकरण करने की घोषणा की। सी.आई.ए. द्वारा जारी किए गए दस्तावेज़ों से पता चलता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइज़नहॉवर ने लुमुम्बा की हत्या के निर्देश जारी कर दिए। लुमुम्बा को फाँसी दे दी गई और उनके शरीर को तेज़ाब में डालकर गला दिया गया। सी.आई.ए. ने उनके स्थान पर जोज़ेफ़ मोबुतु को गद्दी पर बिठा दिया। जोज़ेफ़ एक तानाशाह था, जिसने 34 वर्ष तक राज किया।
1963 में वियतनाम के राष्ट्रपति न्गो दिन्ह दियेम ने अमेरिकी आदेश मानने से इंकार कर दिया। सी.आई.ए. ने विद्रोह की स्थिति पैदा की और राष्ट्रपति एवं उनके भाई की हत्या कर दी। अमेरिका ने वियतनाम में पाँच लाख सैनिक तैनात कर दिए, जिसके बाद लाखों लोगों की जानें गईं। अमेरिका को अंततः अपना मुँह छिपाकर वहाँ से भागना पड़ा।
1966 में पश्चिमी अफ़्रीकी देश घाना के राष्ट्रपति क्वामे एनक्रूमाह ने पश्चिमी देशों के बैंकों और आई.एम.एफ़ से नाता तोड़ लिया। सी.आई.ए. द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेज़ों से साफ़ हो जाता है कि उनके विरुद्ध सैनिक विद्रोह में सी.आई.ए. का हाथ था। जब राष्ट्रपति क्वामे चीन की यात्रा पर थे, उन्हें पद से अपदस्थ कर दिया गया।
1973 की बात है, जब चिली के राष्ट्रपति साल्वाडोर एलेंडे ने कॉपर की खदानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। आँकड़े बताते हैं कि सी.आई.ए. ने उस समय राष्ट्रपति साल्वाडोर को सत्ता से हटाने के लिए लगभग 80 लाख डॉलर ख़र्च कर डाले। जनरल ऑगस्तो पिनोशे ने तख़्तापलट करते हुए सत्ता हथिया ली। राष्ट्रपति साल्वाडोर एलेंडे इस विद्रोह में मारे गए और करीब चालीस हज़ार चिली के लोगों की जनरल पिनोशे की तानाशाही के काल में हत्या की गई।
2003 में अमेरिका ने इराक़ पर हमला कर दिया। तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने सामूहिक विनाश के हथियारों का निर्माण कर लिया है। सद्दाम हुसैन को फाँसी पर चढ़ा दिया गया। बाद में अमेरिका ने माना कि सामूहिक विनाश के हथियारों वाली सूचना ग़लत थी। अमेरिका की इस कार्रवाई में दस लाख से अधिक इराकियों की हत्या हो गई। इराक़ आज भी अस्थिरता से भरा हुआ देश है।
2011 में लीबिया के राष्ट्रपति मुअम्मर मुहम्मद अबू मिन्यार अल-ग़द्दाफ़ी ने डॉलर के स्थान पर एक नई मुद्रा की घोषणा करने की ग़लती कर दी। यह मुद्रा सोने पर आधारित एक अफ़्रीकी करेंसी बनने वाली थी। नाटो देशों और अमेरिका ने लीबिया पर बमबारी शुरू कर दी। ग़द्दाफ़ी को लीबिया की सड़कों पर दौड़ा-दौड़ाकर मार दिया गया। उसके बाद से आज तक लीबिया में ऐसी अव्यवस्था फैली हुई है, जो अब तक ठीक नहीं हो पाई।
अमेरिका ने यही हाल चे ग्वेरा (क्यूबा – 1967), निकारागुआ, ग्रेनेडा और पनामा के साथ भी किया। अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत सेनाओं को हराने के लिए अमेरिका ने मुजाहिदीन का साथ लिया और बाद में वही तालिबान बनकर अमेरिका के विरुद्ध खड़े हो गए। वेनेज़ुएला की घटना तो अभी हमारे दिमाग़ में ताज़ा ही है कि कैसे वहाँ के राष्ट्रपति को बंदी बनाकर अमेरिका लाया गया।
और अब अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर ईरान पर हमला बोला है और वहाँ के सुप्रीम नेता 86 वर्षीय अली ख़ामेनेई और उनके परिवार के कई सदस्यों की हत्या कर दी। इस समय इस युद्ध को लगभग 15 दिन हो चुके हैं। ईरान अभी तक हारा नहीं है, बल्कि पूरा क्षेत्र ही असुरक्षित हो चुका है।
अब हम बात करते हैं ईरान की। 1979 तक ईरान में माहौल काफ़ी खुला था और महिलाएँ पश्चिमी परिधान पहना करती थीं। मगर 1979 में आयतोल्ला ख़ुमैनी की इस्लामी क्रांति ने ईरान के पूरे स्वरूप को ही बदल दिया। अब ईरान इस्लामिक रिपब्लिक बन चुका था। इसकी हज़ारों साल पुरानी सभ्यता से इसका नाता लगभग टूट गया था। अब ईरान वह ईरान नहीं था, जिसके भारत के साथ पुराने रिश्ते थे। अब ईरान शरिया क़ानून वाला ईरान बन गया था।
5 नवंबर 1979 को आयतोल्ला ख़ुमैनी के हवाले से कहा गया कि- “अमेरिका एक महान शैतान है… घायल साँप है।” इन शब्दों का इस्तेमाल इस्लामी क्रांति के दौरान और उसके बाद व्यापक रूप से किया जाता रहा। बल्कि आज भी ईरान के कुछ राजनीतिक हलकों में इसका प्रयोग किया जाता है।
अली ख़ामेनेई, रूहोल्लाह ख़ुमैनी के क़रीबी थे, जो क्रांति के प्रमुख नेता और ईरान के पहले सर्वोच्च नेता बने थे। 1989 में ख़ुमैनी की मृत्यु के बाद ख़ामेनेई को उनका उत्तराधिकारी चुना गया। सर्वोच्च नेता बनने से पहले ख़ामेनेई ईरान के राष्ट्रपति रह चुके थे। समय के साथ उन्होंने राजनीति, सेना और अदालतों पर अपना नियंत्रण और भी मज़बूत कर लिया। आलोचकों का कहना था कि उनके शासनकाल में ईरान एक सैन्य तानाशाही जैसा बन गया था।
ईरान की 1979 की क्रांति ने शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के 40 साल पुराने शासन को गिरा दिया था। उस समय उनके बड़े बेटे रज़ा पहलवी सिर्फ़ 16 साल के थे, तेल से समृद्ध, हज़ारों साल पुराने साम्राज्य के उत्तराधिकारी। आज 65 साल की उम्र में, लगभग आधी सदी बाद, वे अपने देश ईरान की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं। उनकी एक आवाज़ पर देश के युवा सड़कों पर उतर आए हैं और फिर से इतिहास दोहराने की तैयारी कर रहे हैं।
अब बात करते हैं इज़राइल की। सबसे पहले हम आपको बता दें कि इज़राइल का क्षेत्रफल महज़ 21,937 वर्ग किलोमीटर है। इसके मुकाबले भारत का क्षेत्रफल इससे लगभग 150 गुना ज़्यादा है। भारत का कुल क्षेत्रफल 3,287,263 वर्ग किलोमीटर है। यानी इज़राइल का आकार भारत का लगभग 0.67 प्रतिशत है। भारत की जनसंख्या लगभग 140 करोड़ है, जबकि इज़राइल की आबादी लगभग 1 करोड़ के आसपास है।
क़ुरआन शरीफ़ में भी इज़राइल और यहूदियों का ज़िक्र मिलता है। सच तो यह है कि हज़रत ईसा मसीह भी जन्म से यहूदी ही थे। ज़ाहिर है कि वे उसी क्षेत्र की भाषा में ही बात भी करते होंगे। विश्व में लगभग 57 इस्लामी देश हैं और सौ से अधिक ईसाई बहुल देश हैं, मगर एक ही छोटा सा देश है जो सदियों के निर्वासन के बाद यहूदियों को नसीब हुआ है। जब से यह देश बना है, इसे कई इस्लामी देशों ने स्वीकार नहीं किया है। वैसे इस मामले में हिंदू यहूदियों से भी अधिक बदनसीब हैं, क्योंकि वर्तमान में उनके लिए विश्व भर में एक भी अलग राष्ट्र-राज्य नहीं है।
अली ख़ामेनेई ने इज़राइल के बारे में कई बार कहा कि- “अब समय आ गया है कि इज़राइल को दुनिया के नक्शे से मिटा दिया जाए।” उन्होंने हमेशा अमेरिका को भी धमकाया। अपने आख़िरी सार्वजनिक बयान में ईरान के स्वर्गीय सुप्रीम लीडर आयतोल्ला अली ख़ामेनेई ने अमेरिका को सीधे निशाने पर लेते हुए कहा था कि “अमेरिकी साम्राज्य पतन की ओर बढ़ रहा है” और दशकों की कोशिशों के बावजूद अमेरिका ईरान को खत्म नहीं कर पाया।
उन्होंने डॉनाल्ड ट्रंप की सैन्य धमकियों को खारिज करते हुए दावा किया कि ईरान किसी भी बाहरी दबाव के सामने झुकेगा नहीं और इस्लामिक रिपब्लिक को खत्म करना असंभव है। यह भाषण उनकी मृत्यु से कुछ दिन पहले दिया गया था और सच तो यह है कि पूरा का पूरा मध्य-पूर्व संकट से घिरा हुआ है।
पुरवाई पत्रिका का मानना है कि किसी भी देश को विश्व में दादागिरी करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। अमेरिका का रुख़ शुरू से ही भारत और पाकिस्तान के मामले में हमेशा भारत के विरुद्ध रहा है। अमेरिका कहने को एक लोकतांत्रिक देश है और भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र, मगर अमेरिका सदा ही पाकिस्तान के तानाशाहों के समर्थन में खड़ा दिखाई देता रहा है।
हमारे हिसाब से वर्तमान युद्ध को रोकने का एक ही तरीका है कि तमाम इस्लामिक देश इज़राइल के अस्तित्व को स्वीकार करें, और अपने यहाँ से चलने वाले आतंकवादी संगठनों पर लगाम लगाएँ। दूसरी तरफ़ अमेरिका विश्व का चौधरी बनने का नाटक बंद करे और दुनिया को चैन से जीने दे।
(संकलित)