कविता

अहम का संघर्ष : विनाश का द्योतक

आज समूचा विश्व अहम के संघर्ष में फँसता जा रहा है 

विश्व आशंकाओं के बीच डर-डर कर जी रहा है,

निरपराध, निर्दोष मारे जा रहे हैं,

मूलभूत सुविधाएं गर्त में जा रही हैं,

संसाधन बर्बाद हो रहे हैं,

प्रकृति के साथ विनाश का खेल खेला जा रहा है।

बम, गोला, बारुद से मौत का ताँडव किया जा रहा है 

लाशों के ढेर लगते जा रहे हैं 

जहाँ जीवन की खुशहाली थी 

घर, दुकान, मकान, संस्थान, बड़ी – इमारतें 

वर्षों की साधना से तैयार जन जीवन को

सुविधा देने वाली खोजें, 

लाखों करोड़ों, अरबों खर्च कर 

विकास की गंगा में बारुद रुपी जहर घोला जा रहा है,

रोजी, रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा को

आदिम युग की ओर ढकेला जा रहा है।

विचारणीय प्रश्न है कि इसका परिणाम क्या होगा?

अहम का यह संघर्ष कब और कहां जाकर रुकेगा?

कुछ सनकी और विकृत मानसिकता का शिकार 

क्या समूची मानवता और धरा के

विनाश का द्योतक बनेगा?

और इस धरती से मानव ही नहीं 

जीव-जंतु, कीड़े-मकोड़े, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे 

और खरपतवारों के नामोनिशान के साथ ही खत्म होगा?

क्या अहम के संघर्ष का इस तरह ही अंत होगा?

क्या धरती पर भूत-प्रेतों का डेरा होगा,

मंदिर, मस्जिद, गिरिजा, गुरुद्वारों में 

भक्त नहीं सिर्फ, ईश्वर, अल्लाह, ईशामसीह 

और गुरुग्रंथ साहिब के सिवा परिंदा भी नहीं होगा?

तब इस संघर्ष का लाभ आखिर किसको मिलेगा?

जब धरा पर कुछ भी नहीं होगा,

अपना तो छोड़िए जब कोई दुश्मन भीहमारे सामने ही नहीं होगा।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921