ग़ज़ल
लीक से हटकर चल रही दुनिया।
आज नियमों से टल रही दुनिया।।
काम कुछ भी नहीं सभी चलते।
क्यों न जाने टहल रही दुनिया।।
भेद भाव रख आज बढ़ते हैं।
अब न जाने क्यों जल रही दुनिया।।
चढ़ शिखर आज बढ़ रहे सब ही।
कर्म करते सफल रही दुनिया।।
आग लगती गयी डरे बच्चे।
नफ़रतों से दहल रही दुनिया।।
सब मुखौटा लगा बदलते हैं।
एक-दूजे को छल रही दुनिया।।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
