उम्र
वे मेरी वरिष्ठ थीं । वरिष्ठ इसलिए, क्योंकि मैंने जब अध्यापिका की नौकरी उस प्रतिष्ठित विद्यालय में ग्रहण की थी तब वह एक लंबा जीवन अध्यापिका बतौर जीकर उप- प्रधानाध्यापिका के पद पर आसीन हो चुकी थीं । छोटा कद, स्नेहिल नेत्र, कर्तव्यों और अधिकारों का समान रूप से संयोजन कर लेने वाली दिलकश व्यक्तित्व की स्वामिनी मंजुला जोशी गणित की शिक्षिका, कैलकुलेटर से भी तेज गणना करने वाली थीं ।
कई वर्ष हो गए उन्हें सेवानिवृत हुए । बीच में शिक्षिकाओं या उनके निवास के आसपास रहने वाले विद्यार्थियों से उनका जिक्र होने पर पता चला कि वह अब अपने पुत्र के परिवार के साथ प्रायः मुंबई में ही रहती हैं । संपत्ति की देखभाल, बैंक आदि के कार्य अथवा निजी पारिवारिक या मित्र मंडली के द्वारा निमंत्रित किये जाने पर ही अपने शहर में उनका आना होता है ।
एक दिन मैं अध्यापक कक्ष में बैठकर , विद्यार्थियों की कॉपियाँ चेक कर रही थी । नितांत अकेली थी। चाय पीने का मन हो आया । नजरें उठाई थीं कि किसी चपरासी या आया को आवाज दूँ, तभी सामने मंगला जोशी मैडम खड़ी दिखाई दीं । कुछ दुबली सी, मेकअप से उम्र को छिपाते हुए बिल्कुल तरोताजा , खिली-खिली सी । छोटी होने का दिखावा करने के लिए नई रंगीन चमकदार साड़ी । देखते ही चहक पड़ीं -“अरे ! अभी तक तुम यहीं हो । मैं तो डरते -डरते आई थी कि अब मेरे जमाने का कोई यहाँ होगा भी या नहीं ।” कहते हुए, उन्होंने मुझे गले से लगा लिया । मैंने झुक कर प्रणाम करते हुए उनका भली -भांति स्वागत किया । चाय का आदेश आया को देने के पश्चात बातों का सिलसिला चल निकला । मैं भी अभिभूत थी । उस समय की शिक्षिकाओं से संबंधित तमाम पुरानी यादों का पिटारा खुल चुका था । इस उम्र में भी उनकी याददाश्त की कायल होते हुए मैंने उन्हें दाद दी तो वे बोलीं ” उन्यासी पार कर लिए हैं । मेरी माँ कहा करती थीं – अस्सी मत्त खस्सी यानि अस्सी वर्ष के बाद मस्तिष्क के तार ढीले पड़ने लगते हैं । अभी तक तो सब ठीक ही है । देखो, अस्सी पार करने के बाद यादों के तार शायद ढीले पड़ जाएं । अभी तो याददाश्त ठीक है ।”
बातों ही बातों में उनकी सेवा निवृत्ति वाली पार्टी की शाम भी तरोताजा हो उठी । वे बोल पड़ीं ” देखो 31 मार्च 2001 और अब 2025 पूरे 24 साल से ज्यादा हो गए मुझे सेवा निवृत हुए । मैंने उनसे कहा सेवानिवृत्ति की उम्र शिक्षकों की कभी 60 वर्ष से कम की भी रही है क्या ? वह मेरा तंज शायद समझ न पाईं और बोलीं “नहीं ! मेरी याद में तो कई बार बासठ वर्ष कर दी गई है पर साठ वर्ष से कम कभी नहीं की गई । मैं खुद बासठ वर्ष की होकर रिटायर हुई हूँ । उस समय सन दो हज़ार से शिक्षा विभाग द्वारा शिक्षकों की सेवा निवृत्ति उम्र बासठ वर्ष कर दी गई थी और जो दो हज़ार पाँच तक लागू रही । तुम्हारी सेवा निवृत्ति में अभी कितना समय शेष है ? ” उन्होंने मुझसे पूछा । मैंने बताया “अभी दो वर्ष हैं ।”
आया चाय के कप सामने रख गई । चाय पीते हुए उनके चेहरे की सौम्यता, शिष्टता और अपनत्व की मुद्रा को अनुभूत करते हुए मैं सोचने लगी महिला कितनी भी विदुषी क्यों ना हो, गणितज्ञ भी हो , पर कम उम्र होने का दिखावा क्यों करती है ?वह अपनी उम्र छुपाती क्यों है ? बताते समय अपनी उम्र से पाँच वर्ष घटाती क्यों है ?
— बृज बाला दौलतानी, आगरा
