अंधी दौड़
अपनी परेशानियो को हवश पर सवार कर
अपनी हसरतो और खुशियो को दांव पर लगाकर
इंसान दर दर भटकता है
मारा मारा फिरता है
अपने गम के पिजड़े में कैद
सलाखो से सर फोड़ता है।
इंसान इतना बेसब्र है
पलभर ठहर कर सोचता ही नहीं
जिसकी तलाश में इधर उधर भटकता है
वह उसके अंदर कहीं निहित है।
इंसान को जीने के खातिर
चाहिए ही क्या ?
थोड़ा आराम और थोड़ा सुकून
थोड़ी सहुलियत, थोड़ी दौलत
लेकिन………….
दौलत की अंधी दौड़ में
बाकी सब पीछे छोड़ जाता है ।
— विभा कुमारी “नीरजा”
