सामाजिक

समय के चक्र ने इंसानी व्यवहार को पूरी तरह बदल दिया है

इंसानी समाज की नींव हमेशा से सच्चे दिल, सम्मान और आपसी दया पर टिकी रही है। इतिहास के पन्ने पलटकर देखें तो एक ऐसा समय दिखता है, जब रिश्तों को अपनी जान की आहुति देकर सींचा जाता था। “पुराने लोग बहुत अच्छे हुआ करते थे” ये बात वास्तव में उस स्वर्ण युग की याद दिलाती है, जहां इंसान की पहचान उसका धन-दौलत नहीं, बल्कि उसका बड़ा दिल और ऊंचा चरित्र होता था। उस ख़ुशहाल दौर में अगर किसी को थोड़ी-सी मोहब्बत भी मिल जाती, तो बदले में वह अपनी पूरी ज़िंदगी न्यौछावर कर देता। वे लोग थे जिनके पास वादों को निभाने के लिए अपनी जान तो थी, लेकिन धोखे और छल की कोई गुंजाइश ही नहीं। उनके लिए “वफ़ादारी” एक पवित्र कर्तव्य थी, जिसे वे अपनी अंतिम सांस तक निभाते हुए अपनी ऊंचाई मानते थे।

लेकिन दुख की बात है कि समय के चक्र ने इंसानी व्यवहार को पूरी तरह बदल दिया है। आज के भौतिकवादी युग में हमने विकास की ऊंचाइयां तो छू लीं, ब्रह्मांड के रहस्यों पर विजय पा ली, लेकिन अपने अंदर के इंसान को खो बैठे। “अब लोग बहुत समझदार हो गए हैं”। ये समझदारी असल में चालाकी और स्वार्थ है, जिसने रिश्तों की पवित्रता को कुचल दिया है। आज का इंसान भावनाओं को भी फ़ायदे-नुकसान के तराज़ू पर तौलता है। अगर आप आज किसी को अपनी सच्ची मोहब्बत, असीम खुलापन और अटूट विश्वास का उपहार दें, तो वह वफ़ादारी से जवाब देने के बजाय आपको ऐसा “सबक़” सिखा देता है जो आपकी आत्मा को घायल कर देता है। ये सबक़ वास्तव में उस भरोसे का क़त्ल है, जो एक इंसान दूसरे पर करता है।

हम जिस दौर में जी रहे हैं, यहां मुनाफ़े की सोच ने सच्चाई की जगह ले ली है। लोग आपके साथ तब तक जुड़े रहते हैं, जब तक उनका फ़ायदा जुड़ा हो। जैसे ही फ़ायदे का धागा टूटता है, सारे दावे और वादे रेत की दीवार की तरह ढह जाते हैं। जिसे हम “आधुनिकता” और “बुद्धिमत्ता” कहते हैं, वो असल में नैतिक दिवालियापन की चरम सीमा है। क्या ये वाक़ई समझदारी है कि हम दूसरों की भावनाओं के साथ खेलें? क्या ये बुद्धि है कि मोहब्बत के बदले धोखा दें? अगर यही समझदारी है, तो निश्चित रूप से वो पुराना “भोलापन” और “नादानी” हज़ार गुना बेहतर थी, जहां कम से कम इंसानियत ज़िंदा थी।

आज ज़रूरत इस बात की है कि हम अपनी इन खोई हुई मूल्यों को फिर से खोजें। हमें इस “समझदारी” के खोखले छिलके से बाहर निकलकर उन पुराने लोगों की तरह बनना चाहिए, जिनके दिल विशाल थे और ज़ुबान पर सच्चाई  थी। जब तक हम रिश्तों को भौतिक फ़ायदों से ऊपर नहीं रखेंगे, तब तक समाज में वो शांति और संतोष नहीं आ सकता, जो हमारे पूर्वजों की ख़ासियत थी। हमें समझना होगा कि ज़िंदगी सिर्फ़ सबक़ सिखाने का नाम नहीं, बल्कि एक-दूसरे की मदद करने और मोहब्बत बांटने का नाम है।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।